बंटवारे में हुए नरसंहार के बाद सब यही प्रार्थना कर रहे थे कि हिंदुस्तान को धर्म के नाम पर यूं क़त्ल-ऐ-आम फिर कभी न देखना पड़े, पर 90 के शुरूआती दौर में वोटरों को भुनाने और राजनीतिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए साज़िशों का एक दौर शुरू हुआ. अपनी राजनीतिक रोटियों को सेंकने के लिए नेताओं ने राम के नाम का सहारा लिया, जिसकी आड़ में बाबरी मस्जिद को निशाना बना कर गिरा दिया गया.

बाबरी मस्जिद को गिराने में जो लोग शामिल हुए उन्हें कार सेवक कहा गया. इन कार सेवकों में कई लोग ऐसे भी थे, जिन्हें धर्म के नाम पर बरगला के भड़काया गया था. ऐसे ही लोगों में एक नाम बलबीर सिंह भी था. बलबीर मूलरूप से हरियाणा के पानीपत के रहने वाले थे, जबकि उनके पिता एक स्कूल में टीचर थे.

बलबीर ने बताया, 'मेरे पिता ने बंटवारे का वो दौर भी देखा था, जब धर्म के नाम पर सारे देश में कत्लेआम का खेल चल रहा था, पर मेरे पिता जी गांधी जी के विचारों को मानाने वाले थे. उन्होंने हमारे क्षेत्र में रह रहे मुस्लिम परिवारों की सुरक्षा का ज़िम्मा उठाया और हर वो मुमकिन कोशिश की, जिससे वो मुस्लिम परिवार ख़ुद को महफूज़ महसूस करे. मेरे पिता जी चाहते थे हम तीनों भाई भी उन्हीं के आदर्शों का निर्वाहन करें.'

बलबीर जब 10 साल के हुए, तब उनका परिवार गांव छोड़ कर पानीपत के शहरी इलाके में आ कर बस गया था. एक 10 साल के लड़के के लिए पानीपत शहर वैसा नहीं था, जैसा उसने सोचा था. इस शहर ने गांव के एक लड़के के साथ भेदभाव करना शुरू कर दिया. खेल के समय भी शहर के लड़के कभी बलबीर के कपड़ों, तो कभी उसकी बोली को ले कर मज़ाक बनाया करते थे. इस माहौल में बलबीर खुद को अकेला महसूस करने लगा. ये वही समय था जब बलबीर आरएसएस के सम्पर्क में आये. बलबीर ने देखा कि शाखा का माहौल शहर की दुनिया से काफ़ी अलग है. यहां कोई उनका मज़ाक नहीं उड़ाता. इस बारे में बलबीर का कहना है कि 'मुझे याद है कि पहली बार शाखा में ही किसी ने मुझे आप कह कर पुकारा था. मुझे यहां अच्छा लगने लगा था.'

एक दशक तक शाखा से जुड़े रहने के बाद बलबीर शिव सेना के सम्पर्क में आये और अपने भाई के साथ उनके लिए काम करने लगे. इसी दौरान बलबीर की शादी भी हो गई, पर उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी और महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक से हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस और इंग्लिश में ट्रिपल MA किया. गांधी के विचारों को मानाने वाले एक परिवार में किसी कट्टर हिन्दू का होना बलबीर को अखरने लगा था. उनके राजनीतिक विचारों को ले कर लोग उन्हें ‘चड्डीवाला’ कह कर पुकारने लगे.

बलबीर का कहना है 'लोग समझते थे कि मैं वाकई में कट्टर हिन्दू हो गया हूं, पर ये सच नहीं था. अपने पिता की तरह मैं भी मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करता था. शायद ही कभी ऐसा वक़्त आया हो, जब हम मंदिर गए हों. इसके अलावा हमारे घर में गीता भी थी, पर मैंने कभी उसे पढ़ा भी नहीं. फिर वो दौर शुरू हुआ जब बाबर और औरंगज़ेब के नाम पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काया जा रहा था. इस तरह की भावनाओं से मैं भी प्रभावित हुआ और आसानी से मेरा ब्रेनवॉश कर दिया गया. मुझे लगने लगा कि मुसलमान देश के बाहर से आये हैं और इन्होंने हमारे मंदिरों को नष्ट किया है.'

बलबीर आगे कहते हैं कि 'हरियाणा जैसे राज्य में दूसरे तरह का ही माहौल होता है. यहां धर्म से जुड़ा कोई भी सवाल मर्दानगी को आहत करता है. जब मैं अयोध्या जाने के लिए पानीपत से निकलने वाला था, तो मेरे दोस्तों ने मुझे कहा कि कुछ करे बिना वापस न आना.'

5 दिसंबर को जब बलबीर अयोध्या पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि लोगों का हुजूम उमड़ा हुआ है. हज़ारों की संख्या में कार सेवक फैज़ाबाद में इक्कट्ठा थे. फैज़ाबाद उस समय किसी विश्व हिन्दू परिषद के नेता का चुनावी गढ़ था. कार सेवक 'सौगंध राम की खाते है, मंदिर यहीं बनाएंगे' ‘कल्याण सिंह कल्याण करो, मंदिर का निर्माण करो' के नारे के साथ आगे बढ़ रहे थे. बलबीर कहते हैं कि 'अडवाणी जी हमारे लिए महत्व नहीं रखते थे, क्योंकि वो सिंधी थे और उनका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं था, पर सारा मोर्चा उमा भारती ने संभाला हुआ था, जो उस समय एक बड़ी ड्रामा क्वीन लग रही थी. मैं अपने एक दोस्त योगेंदर पाल के साथ वहां मौजूद था, जिसके कहने पर हम आगे बढ़ गए.'

बलबीर उस काले दिन को याद करते हुए कहते हैं कि 'उस दिन मेरे सिर पर जैसे जंगली जानवर सवार हो गया था. मैं हज़ारों कार सेवकों के साथ आगे बढ़ रहा था. हम सब में जल्दी से जल्दी बाबरी मस्जिद तक पहुंचने की होड़ मची हुई थी. हर कोई उसे गिराने के लिए उत्साहित था. मेरे हाथ में कुल्हाड़ी थी, जिससे मैंने बाबरी मस्जिद के एक गुम्बद पर चोट करके गिराने में जुट गया मेरे साथ और भी कई लोग थे, जो ऐसा करने में लगे हुए थे.'

आखिरकार मस्जिद गिर गई और बलबीर और उनके दोस्त अयोध्या से दो ईंटे ले कर पानीपत लौट आये. उन्होंने ये ईंटे शिव सेना के स्थानीय दफ़्तर में रख दी. बलबीर जब घर लौटे, तो पिता जी ने उन्हें सीधी चेतावनी दे डाली कि अब या तो वो इस घर में रहेंगे या बलबीर रहेगा. आखिर में बलबीर ने घर छोड़ दिया, वो चाहते थे कि उनकी पत्नी भी उनके साथ आये, पर वो भी पिता जी की बातों से सहमत थी इसलिए बलबीर को अकेले ही घर छोड़ना पड़ा. देश भर से दंगों की ख़बरें आने लगी थी, ख़ुद को महफूज़ रखने के लिए बलबीर भी कभी खेत, कभी किसी नाले के पास रह कर रात काटने लगे. बलबीर कहते हैं कि 'मैं किसी भी दाढ़ी वाले शख़्स को देखकर डरने लगा था. कई महीनों तक मैं इधर-उधर भागता रहा. इस दौरान मैं उस समय घर लौटा, जब मेरे पिता जी का देहांत हुआ, पर मेरे पिता जी कहे अनुसार, मुझे उनके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने दिया गया. उनका मानना था कि मैं ही उनके मौत की वजह हूं.' बलबीर को उस समय इससे भी ज़्यादा गहरा सदमा लगा, जब उन्हें पता चला कि उनके दोस्त योगेंद्र पाल ने इस्लाम कबूल कर लिया है. बलबीर जब उनसे मिले, तो उसने बताया कि 5 दिसंबर की घटना के बाद उसे बुरे ख़्याल आने लगे, वो हर किसी से डरने लगा.

करीब 6 महीने बाद बलबीर सोनीपत पहुंचे और मौलाना कलीम सिद्दीकी से मिले. ये वही शख़्स था, जिसने योगेंद्र को इस्लाम कबूल कराने में मदद की थी. सिद्दीकी 'जमीअत इमाम वलीउल्लाह ट्रस्ट फॉर चैरिटी एंड दा’वाह' के हेड थे, जिनके उत्तर भारत में कई मदरसे और स्कूल थे. सिद्दीकी साहब सोनीपत में किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये हुए थे. उनसे मिलने के बाद बलबीर ने उन्हें बताया कि उसने अयोध्या में क्या किया है और उनसे मदरसे में रहने की इज़ाज़त मांगी. बलबीर का कहना है कि 'मैं ख़ुद नहीं जनता था कि मुझे इस्लाम कबूल करना है या नहीं. इस पर सिद्दीकी साहब ने मेरी बात मान ली और मुझसे कहा कि 'मैंने एक मस्जिद तोड़ने में मदद की है, तो वही मदद अब मैं दूसरी मस्जिदों को बनाने में कर सकता हूं. उनकी बात सुनकर मैं काफ़ी रोया और वहीं बैठ गया. इसके बाद मैं कई महीनों तक मदरसे में रहा और इस्लाम कबूल करके बलबीर से मोहम्मद आमिर बन गया.'

आमिर बने बलबीर आगे कहते हैं कि 'इसके बाद मेरी ज़िन्दगी फिर से चल पड़ी.' फूलत के मदरसे में रहते हुए आमिर ने अरबी भाषा सीखी और क़ुरान पढ़ने लगे. वो ख़ुद इंग्लिश में डिग्री ले चुके थे इसलिए उन्होंने यहां भी बच्चों को इंग्लिश पढ़ानी शुरू कर दी. 1993 अगस्त में उन्हें अपने परिवार से मिलने का मौका मिला. अपने पति का बदला हुआ स्वभाव देख कर उनकी पत्नी भी उनके पास लौट आई और इस्लाम कबूल करके उनके साथ रहने लगी.

मोहम्मद आमिर दावा करते हैं कि 1993 से ले कर 2017 तक वो उत्तर भारत में कई मस्जिदों का जीर्णोद्धार करवा चुके हैं. इनमें से कई मस्जिदें ऐसी थीं, जिनके बारे में वक़्फ़ बोर्ड के पास भी कोई जानकारी नहीं थी. आमिर का कहना है कि 'हाथरस के मेंदु में कई मस्जिदें ऐसी थीं, जो लगभग गिर ही चुकी थी. मैं ऐसे इलाकों में जा कर फिर से मस्जिद का निर्माण कराता हूं और लोगों से अपील करता हूं कि वो नमाज़ के लिए यहां आयें. मस्जिदों के अलावा मैं मदरसों का भी निर्माण कराता हूं, क्योंकि मुझे लगता है कि केवल शिक्षा के द्वारा ही हम दुनिया को बदल सकते हैं.' आमिर का उद्देश्य है कि वो कम से कम 100 मस्जिदों को फिर से खड़ा कर सकें.

फ़िलहाल आमिर मालेगांव के निकट रह कर आस पास के लोगों के बीच अमन और प्रेम का संदेश फैलाने में लगे हुए हैं.

आमिर का पूरा इंटरव्यू टाइम्स ऑफ़ इंडिया की वेबसाइट पर मौजूद है, जहां आप इसे इसके असल रूप में पढ़ सकते हैं. आमिर की कहानी को लिखते वक़्त मुझे खुद ऐसा लगा कि बेशक कट्टरपंथी ताक़तों ने गांधी जी को मार दिया हो, पर उनके विचारों को नहीं मार पाए. और ये किसी धर्म विशेष के प्रति मेरा या इस वेबसाइट का ख़ास लगाव नहीं है. ये एक ऐसे आदमी की कहानी है, जिसने अपने पश्चाताप के लिए सही रास्ते को चुना. यहां धर्म नहीं, नीयत मायने रखती है.