'तुम छोले अच्छे बनाती हो'

'मैं तो सिर्फ़ तुम्हारे हाथ का ही खाना खाऊंगी'

'एक कप चाय मिल जाती तो मज़ा आ जाता'

ऐसे जुमले आपके घर में डेली आपसे कहे जाते होंगे. मगर ये कम ही सुनने को मिलता है कि मैं खाना अच्छा बनाता हूं, आज मैं बनाकर खिलाऊंगा. ऐसे जुमले आपकी सेहत के लिए हानिकारक हैं. शायद इसीलिए कोई नहीं बोलता...मगर कुछ जगहों पर ये हानिकारक नहीं हैं इसलिए लड़कियों को सुनने को मिल जाते है.

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इसलिए ये आर्टिकल एक लड़की के सामाजिक दायरे, उसके अधिकारों या उसकी समाज में जगह को लेकर नहीं है, क्योंकि इस पर पहले भी बहुत बात की जा चुकी है और लड़कियां ख़ुद को साबित कर चुकी हैं. अब उन्हें किसी के लिए भी ख़ुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं है. बस ज़रूरत है एक समझदार साथी और परिवार की.

ये आर्टिकल उस जद्दोजहद को लेकर है जो शायद आज कई लड़कियों के मन में रहती है कि जिस मक़ाम को पाने में ज़िंदगी लगा दी, उसे पाने के बाद भी किचन ही उनका अस्तित्व क्यों है? क्यों लड़कों की तरह मैं भी घर आकर अपने बेड पर आराम से नहीं बैठ सकती? ऐसा सिर्फ़ इसलिए तो नहीं होता कि वो एक लड़की है? हमारी एक परंपरा चली आ रही है कि कितने भी झंडे गाड़ लो, मगर खाना तुम्हें ही बनाना है.

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अच्छा मैं हर उस लड़के से ये पूछती हूं जो ऑफ़िस जाते हैं. उनके ऑफ़िस में भी लड़कियां होंगी, कभी उनको बात करते सुना होगा कि यार घर जाओ फिर काम करो, खाना बनाओ जैसे अपनी कोई और ज़िंदगी नहीं है. उनकी इस बात पर लेक्चर तो तुम ख़ूब देते हो. फिर शाम को घर जाकर वही करते हो, जो सुबह तुमसे किसी लड़की ने शेयर किया था. तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि उस लेक्चर को उसके साथ-साथ अपने पर भी अपनाना चाहिए? जिस दिन तुम उस लेक्चर को ख़ुद पर अमल करोगे न, उस दिन से कोई भी लड़की इस असमंजस में नहीं रहेगी कि उसका अस्तित्व क्या है ?

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चलिए मैं आपसे कुछ शेयर करती हूं ये किसी वर्किंग वुमेन पर नहीं है लेकिन ये उस हाउस वाइफ पर है जो एक ऐसी वर्किंग वुमेन है जिसका वर्क किसी काम का नहीं है. जो मुझे कहीं ना कहीं ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि उसमें और ऑफ़िशियली वर्किंग वुमेन में क्या अंतर है. अगर अंतर है तो सिर्फ़ इतना कि हाउस वाइफ़ को छुट्टी नहीं मिलती और उसे मिल जाती है (छुट्टी सिर्फ़ ऑफिस से, खाना बनाने से नहीं). 

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दरअसल आज सुबह ही मेरी एक फ्रेंड का कॉल आया (जो एक हाउस वाइफ़ है) और उसने फ़ोन उठाते ही सीधे बोला कि यार लाइफ़ में कुछ नहीं बचा...मैं घबरा गई और पूछा ऐसा क्या हुआ तो उसने बताया कि सब ऑफ़िस जाते हैं और मैं सबको टिफ़िन लगाकर देती हूं, उसके बदले थैंक यू तक नहीं बोलते. सब ऐसे अपना-अपना टिफ़िन उठाकर चले जाते हैं जैसे मैं कोई बावर्ची हूं. मैं मानती हूं मैं जॉब नहीं करती, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं कुछ नहीं करती... उसकी ये बात ग़लत नहीं है, वो घर पर है तभी तुम बाहर आराम से काम कर पा रहे हो.

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लेकिन मैं फ़िर से वहीं प्रश्न उठाती हूं कि दोनों में फ़र्क़ क्या है? ये सिर्फ़ उस नज़रिए का फ़र्क़ तो नहीं जो कहता है कि खाना बनाना सिर्फ़ लड़की का काम है. इसके लिए ज़रूरत है सिर्फ़ नज़रिया बदलने की. क्योंकि जहां तक रही बात लड़कियों को ख़ुद को साबित करने की, तो वो कर चुकी हैं.