समाज और संस्कृति की बातें करने वाले हमारे देश में हर रोज, हर मिनट महिलाओं का बलात्कार हो रहा है. घर हो या सड़क, बस हो या टैक्सी ऐसी कोई भी जगह नहीं है, जहां पर महिलाएं ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर पाएं.

दंगल गर्ल ज़ायरा वसीम केस में जब पीड़िता ने प्लेन में यात्रा के दौरान अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में सोशल मीडिया पर बताया, तो समाज और संस्कृति की रक्षा की बात करने वाले के कथित ठेकेदारों ने कहा कि ये सब सस्ती लोकप्रियता का एक ज़रिया है. पढ़े-लिखे लोगों तक ने इस वाकये को महज एक पब्लिसिटी स्टंट करार दिया. लोगों ने तो यहां तक बोला कि जैसे फ़िल्म में उसने बॉक्सिंग की थी वैसे ही उस आदमी की पिटाई क्यों नहीं कर दी, तभी शिकायत क्यों नहीं की. मगर उस लड़की की व्यथा किसी ने समझने की कोशिश नहीं की.

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बीते सालों की तो बात ही मत ही कीजिये हम बीते दो-तीन दिनों की दिल-दहला देने वाली घटनाओं पर ही नज़र डालते हैं. इन खबरों को पढ़कर मैं तो बहुत ही असुरक्षित और निराश महसूस कर रही हूं.

दो दिन पहले मैंने एक ख़बर पढ़ी कि हरियाणा में हिसार जिले में उकलाना गांव में एक पांच साल की मासूम बच्ची के का पड़ोस के दो लोगों ने बलात्कार किया. हैवानियत की हद पार करते हुए उन्होंने उसके गुप्तांग में 24 सेंटीमीटर लम्बी एक लकड़ी घुसा दी, जिसके कारण बच्ची का यूट्रस फट गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

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दो दिन पहले की ही दूसरी ख़बर, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आयी, जहां एक 15 साल की ब्लड कैंसर पेशेंट का गैंगरेप उसी के जान-पहचान वाले दो लोगों ने किया उसे एक सुनसान पर मरने के लिए छोड़ कर फ़रार हो गए. उसके बाद जब उसने एक आदमी से मदद की गुहार लगाई तो उसने भी मदद करने के बहाने उसका बलात्कार किया.

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ये घटनाएं साबित करती हैं कि हमारे देश में चाहे 6 महीने की दूधमुंही बच्ची हो या फिर कोई 80-90 साल की बुज़ुर्ग महिला किसी की आबरू सुरक्षित नहीं है. लेकिन यहां मैं सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा की बात ही नहीं कर रही हूं, बल्कि मैं बात कर रही हूं हमारे देश की संस्कृति की.

क्या यही है हमारे देश की संस्कृति, जिसका हम ढिंढोरा पीटते नहीं थकते? क्या हमें शर्म नहीं आनी चाहिए ऐसी घटनाओं पर भद्दी टिप्पणी करते हुए? देश के नेता विश्वपटल पर भारत की संस्कृति की गाथा गाते रहते हैं, फ़िल्म को लेकर संस्कृति का रोना रोते हैं और बखेड़ा खड़ा कर देते हैं. लेकिन क्या उनको ये नहीं दिखता है कि देश में महिलाओं और बच्चियों की आबरू को किस तरह हवस के पैरों तले रौंदा जा रहा है.

जब भी किसी महिला की आबरू को तार-तार किया जाता है और वो इसके विरोध में आवाज़ उठाती है, तो सब उसी को दोष देने लग जाते हैं. उसको तरह-तरह की सलाह दी जाती हैं, पर कभी उसकी आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ को भी बुलंद कर उसके साथ खड़े होने के बारे में क्यों नहीं सोचा जाता है? क्यों नहीं कोई महिला की स्थिति को समझने की कोशिश करता, बयानबाज़ी के अलावा? हम ऐसे समाज में रह रहे हैं जहां लोगों के पास सोशल मीडिया पर लोगों को ट्रोल करने का टाइम तो है, लेकिन देश के अहम मुद्दों पर सवाल करने का नहीं? देश के नेताओं की बात करें या खुद को संस्कृति के रक्षक कहने वालों की क्या एक फ़िल्म उनके लिए महिलाओं की वर्तमान सुरक्षा से बड़ा मुद्दा है?

वैसे तो हम महिला सशक्तिकरण, महिलाओं के अधिकार, सुरक्षा, हर स्तर, हर क्षेत्र में बराबरी जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन जब एक बच्ची या महिला के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जाता है तो उसके लिए केवल महिला को ही दोषी क्यों ठहराया जाता है, तब कहां जाती हैं बराबरी और सशक्तिकरण जैसी बातें?

दिनों दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाओं से मैं तो बहुत ही निराश हूं और आप... आपकी क्या राय है इस बारे में? वो सिर्फ़ पांच साल की बच्ची थी...