भारतीय इतिहास में पहली महिला चीफ़ जस्टिस और दिल्ली हाई कोर्ट की पहली महिला जज बनी लीला सेठ एक मज़बूत महिला थीं. उन्होंने अपनी ज़िंदगी को भरपूर जिया. 86 वर्ष की आयु में उन्होंने नोएडा में अंतिम सांसें लीं, लेकिन उनके काम उन्हें हमेशा के लिए अमर बना गए हैं.

पिता राज बिहारी सेठ की मौत के बाद उनका जीवन अचानक बदल गया था. बहुत कम समय मिलने के बावजूद, उन्होंने लंदन बार की परीक्षा में टॉप किया. ये पहली बार था जब किसी महिला ने इस परीक्षा में टॉप किया था. उनके जीवन में उनके नाम और भी कई उपलब्धियां हुईं. पूरे देश को झकझोर देने वाले निर्भया कांड के दोषियों के को सज़ा दिलाने में भी उन्होंने बेहद अहम भूमिका निभाई है.

इस काण्ड के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पूरे देश में नई चेतना आई थी, जिसके बाद बलात्कारियों के खिलाफ़ सख्त से सख्त कानून बनाने और ऐसे जघन्य अपराध में लिप्त नाबालिगों को भी कड़ी सज़ा दिलवाने की मुहिम छेड़ी गयी.

16 दिसम्बर, 2012 को हुए निर्भया कांड के बाद 3 फरवरी 2013 को क्रिमिनल लॉ अम्नेडमेंट ऑर्डिनेंस आया, जिसके तहत आईपीसी की धारा 181 और 182 में बदलाव किए गए. बलात्‍कार से जुड़े नियमों को कड़ा किया गया और रेप करने वाले को फांसी की सज़ा मिल सके, इसका प्रावधान किया गया. 22 दिसंबर 2015 में राज्यसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल पास हुआ. इस एक्ट में प्रावधान किया गया कि 16 साल या उससे अधिक उम्र के बालक को जघन्य अपराध करने पर एक वयस्क मानकर मुकदमा चलाया जाएगा.

बलात्‍कार, बलात्‍कार से हुई मृत्यु, गैंग रेप और एसिड-अटैक जैसे महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों को जघन्य अपराध की श्रेणी में लाया गया. इसके अलावा वे सभी कानूनी अपराध जिनमें सात साल या उससे अधिक की सज़ा का प्रावधान है, जघन्य अपराध की श्रेणी में शामिल किए गए.

रेप और यौन शोषण से जुड़े कानून को बेहतर बनाने का सुझाव देने के लिए जस्टिस जे. एस. वर्मा कमिटी का गठन किया गया था. लीला सेठ भी इसका हिस्सा थीं. कमिटी ने सरकार से अपनी सिफारिशों को पेश करते हुए कहा कि इस तरह के अपराध कानून की कमी की वजह से नहीं, बल्कि सुशासन की कमी की वजह से होते हैं. कमिटी ने रेप और महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अन्य अपराधों के लिए कानून को सख्त करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.

इस दौरान जस्टिस वर्मा कमिटी ने एक अन्य सुझाव दिया कि महिलाओं को घूरने, उनका पीछा करने जैसे अपराधों पर भी सज़ा का प्रावधान होना चाहिए. कमिटी ने सांसदों और विधायकों को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि सांसदों और विधायकों पर किसी भी तरह का रेप का मामला दर्ज है, तो उन्हें आरोप तय होते ही इस्तीफा दे देना चाहिए.

लीला सेठ हमेशा से महिलाओं को समाज में सामान हक दिलाने के लिए लड़ती रही हैं और कई महत्वपूर्ण कानूनों को बनाने में योगदान देने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा. पुरुषप्रधान पेशे में उस दौर में आना उनके लिए मुश्किलों भरा था, लेकिन वो आज खुद एक मिसाल बन चुकी हैं.

इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने लीला सेठ की मौत पर लिखा था, "जस्टिस लीला सेठ की मौत के बारे में सुन कर दुख हुआ. वो महान जज थीं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली महिला थीं और एक अच्छी इंसान थीं.

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