कहते हैं कुछ नया सीखने, कुछ करने की कोई उम्र नहीं होती. इंसान अगर चाहे, तो अपनी आख़िरी सांस तक सीख सकता है.


ऐसी ही एक महिला, आभा सिंह की कहानी साझा की, कहानी के समंदर Humans of Bombay पेज ने. आभा सिंह वही वक़ील हैं, जो सलमान खान के हिट एंड रन केस में उनके ख़िलाफ़ खड़ी थी.

'मेरा जन्म एक राजपूत परिवार में, एक ऐसा दौर में हुआ जब Gender Rules काफ़ी सिंपल थे. मेरे भाई को दादी काफ़ी ज़्यादा प्यार करती थी, उन्हें सब कुछ मिलता था और मुझे उसका आधा भी नहीं. मेरे घर की औरतें तब तक खाना नहीं खाती थी, जब तक घर के पुरुष नहीं खा लेते थे.


मेरे पापा पुलिस अफ़सर थे और वो रोज़ घर आकर महिलाओं को दहेज के लिए जलाए जाने, मारे-पीटे जाने की कहानियां सुनाते. इसका मुझ पर बहुत प्रभाव पड़ता और मैं कुछ करना चाहती. मैं उन महिलाओं की आवाज़ बन उनकी सहायता करना चाहती पर कैसे?

मेरे माता-पिता मेरा पूरा समर्थन करते पर एक समय आया जब वो समाज के आगे हार गए. 21 की उम्र में मेरी शादी हो गई. मैंने मना नहीं किया क्योंकि मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हो रही थी जिसकी सोच मुझ से मिलती थी. मुझे आज भी याद है, जब मेरी मां ने उनसे दहेज का पूछा, तो उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए. शादी के बाद योगेश ने मुझे काम करने के लिए प्रेरित किया. एक बार भी मुझे घर बैठने या घर संभालने के लिए नहीं कहा.

उस वक़्त वो CBI के लिए काम कर रहे थे, निडर होकर. उन्होंने कुछ बड़े बिज़नेसमेन के विरुद्ध विवादास्पद केस ले लिए और उनके खिलाफ़ साज़िश रचकर उन्हें बाहर कर दिया गया. पर वो रुके नहीं और ख़ुद ही अपना केस कोर्ट में लड़े और जीते भी.

उस पल ने मुझे बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया. इस घटना ने पुरानी आग को हवा दे दी और मैं इस बार किसी भी तरह रुकने वाली नहीं थी. मैं उनसे इतनी प्रभावित हो गई कि 35 की उम्र में मैंने वक़ालत की पढ़ाई करने का निर्णय लिया. लॉ स्कूल और परिवार के बीच बैलेंस बनाते हुए आगे बढ़ी, कई बार तो मेरे बच्चे और मैं साथ में पढ़ते.

मेरा पहला केस था सलमान ख़ान का हिट एंड रन केस और वो भी उनके खिलाफ़. आसान नहीं था, मुझे धमकियां मिलती पर मुझे न्याय के लिए लड़ना था. मैं अकेली महिला समर्थकों की सेना के विरुद्ध खड़ी थी पर जागरूकता लाने के लिए ये काफ़ी था.

उसके बाद से ही मैंने प्रताड़िता की गई महिलाओं के कई केस लड़े हैं. मैं क़ानून के सहारे महिलाओं को सुरक्षित करना चाहती हूं. मैं नहीं चाहती कि मेरी तरह किसी और की परवरिश हो...ये सोचते-सोचते बड़ी हो कि मैं क़ाबिल नहीं हूं या फिर मेरी कोई आवाज़न नहीं है पर अब समय बदल चुका है. 2 दशक और सैंकड़ों केस के बाद मैं उनकी आवाज़ हूं, जिनकी कोई आवाज़ नहीं हैं.'

आभा की कहानी पढ़कर लोगों की प्रतिक्रिया:

आभा प्रेरणा हैं उन लोगों के लिए, जिन्हें लगता है कि उनकी उम्र हो गई है और अब वो कुछ नहीं कर सकते.