बात साल 1984 की है. जब भारतीय सेना द्वारा 3 से 6 जून 1984 को अमृतसर स्थित 'हरिमंदिर साहिब' परिसर को ख़ालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए 'आपरेशन ब्लू स्टार' चलाया गया. उस समय पंजाब में भिंडरावाले के नेतृत्व में अलगाववादी ताकतें सशक्त हो रही थीं, जिन्हें पाकिस्तान से समर्थन मिल रहा था

'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के बाद देश भर में बदले की ज्वाला भड़कने लगी. जिसने कई युवाओं की राह बदल दी, उन्हीं में से एक संदीप कौर भी थीं.

इस घटना के बाद संदीप कौर ने भी हथियार उठा लिये थे और उग्रवादी संगठन 'बब्बर खालसा' से जुड़ गई थीं. लेकिन कुछ समय बाद उन्हें अहसास हुआ कि जिस रास्ते को उन्होंने चुना है उससे कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज वही संदीप कौर निराश्रित बच्चों की ज़िंदगियों में ख़ुशियां भरने का काम कर रही हैं.

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दरअसल, उस दौर में बब्बर खालसा चरमपंथियों का सबसे बड़ा संगठन हुआ करता था. संदीप कौर शादी से पहले ही इस संगठन से जुड़ गई थीं. क्योंकि उस समय इस संगठन का एक नियम था कि कोई भी महिला सदस्य संगठन के ही किसी पुरुष सदस्य से शादी करे.

साल 1989 में संदीप ने बब्बर खालसा में सक्रिय धर्म सिंह काश्तीवाल से शादी कर ली. साल 1992 में धर्म सिंह एक पुलिस ने मुठभेड़ में मरा गया. इसके बाद संदीप कौर हथियारों के लेन देन के आरोप में 4 साल तक संगरूर जेल में बंद भी रहीं.

संदीप कौर बताती हैं कि-

जब वो जेल में थीं तो एक रिश्तेदार उनके इकलौते बेटे को उनसे मिलवाने लाए थे. बेटे से मुलाकात के दिल को झकझोर कर रख दिया कि चरमपंथी गतिविधियों के चलते और लोगों के बच्चे किस हाल में होंगे? उनकी देखरेख कौन करता होगा?

संदीप साल 1996 में जेल से रिहा हुईं. जेल से रिहा होने के बाद संदीप का एक ही मकसद था बेसहारों के लिए काम करना. कुछ साल बाद उन्होंने ऐसे बच्चों की देखभाल के लिए सुल्तानविंड में पति धर्म सिंह के नाम पर 'भाई धर्म सिंह खालसा चेरिटेबल ट्रस्ट' की नींव रखी.

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इसके बाद संदीप ने ऐसे बच्चों की तलाश शुरू की जिनका कोई नहीं था. इन बच्चों को ट्रस्ट में लाकर शिक्षण संस्थानों में दाखिला दिलाया गया. धीरे-धीरे ट्रस्ट में 250 लड़कियों को भी आश्रय मिला. ये बच्चियां उग्रवाद के दौर में परिवार से बिछुड़ गई थीं. वर्तमान में ये ट्रस्ट 1000 से अधिक बच्चों की शिक्षा का दायित्व निभा रहा है.

आज इस ट्रस्ट की अधिकतर लड़कियों को सीबीएसई मान्यता प्राप्त स्कूलों में शिक्षा दिलवाई जा रही है. ये बच्चियां डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, कानून व अकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रही हैं. कुछ बच्चे बीटेक, एलएलबी, एमबीए, एमएससी, एमसीए की पढ़ाई कर रहे हैं. ट्रस्ट में तीन ऐसी लड़कियां भी हैं जो 'संघ लोक सेवा आयोग' की परीक्षा की तैयारी कर रही हैं. संदीप लड़कियों की शादी का खर्च भी ख़ुद ही उठाती हैं.

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'ये बच्चे अनाथ नहीं, मैं उनकी मां हूं, पिता हूं और बहन हूं. मैं नहीं चाहती थी कि चरमपंथियों के ये बच्चे भी उनकी तरह ही बनें. मैं चाहती हूं कि ये अपना करियर बनाने की ओर ध्यान दें और अच्छे इंसान बनें.

लिख चुकी हैं दो किताबें

लिख चुकी हैं दो किताबें संदीप कौर ‘बिखरे पैंडे’ और ‘ओड़क सच’ जैसी दो किताबें भी लिख चुकी हैं. ‘बिखरे पैंडे’ में उन्होंने चरमपंथी आंदोलन और पुलिस की कार्रवाई का ज़िक्र किया है. जबकि ‘ओड़क सच’ उनकी आत्मकथा है. इसमें भी उग्रवादी गतिविधियों का जिक्र किया गया है.

संदीप कौर की इस उपलब्धि को सरकार से भी सराहना मिल रही है. साल 2015 में केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने उन्हें सबसे प्रेरणादायक महिला का अवॉर्ड भी दिया था.