भारत के सरकारी पर्यटन विभाग की टैगलाइन है- 'अतिथि देवो भव:'. क्या हम असल में इसका पालन करते हैं? शायद नहीं, क्योंकि अगर ऐसा होता तो हमारे देश में आए दिन विदेशी पर्यटकों के साथ दुर्घटनाओं की ख़बर नहीं छपती. 

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ऊपर छपी ये ख़बरें बताती हैं कि हम लोग अतिथियों का स्वागत करना भूल गए हैं. हमारे लिए शायद अब अतिथि को भगवान का दर्जा हासिल नहीं रहा है. हिंदुस्तानी होते हुए भी आपने यह बात पर्यटक स्थलों पर महसूस की होगी. किसी विदेशी पर्यटक को देखते ही कैसे ऑटोवाले या कैब वाले उन पर टूट पड़ते हैं. 

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कोई सामान बेचने वाला उनके आगे-पीछे मंडराने लगता है. यही नहीं वो उनके भाषा से अनजान होने का फ़ायदा भी उठाते हैं. वो पहले ही उनसे अपनी सर्विस का दो से चार गुना पैसा वसूल करते हैं. कई कैब वाले तो उन्हें लंबा रूट लेकर मोटा पैसा कमाने की फ़िराक में रहते हैं. जिन्होंने कभी ज़िंदगी में मोल-भाव नहीं किया होता, वो बिना सोचे-समझे उन्हें उनकी मुंह-मांगी क़ीमत अदा कर देते हैं.

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कुछ लोगों ने तो विदेशी पर्यटकों को ठगना और उनसे लूटपाट करना अपना धंधा ही बना लिया है. अगर आपको यह बात कोरी कल्पना लगती है तो आप गूगल पर मामूली रिसर्च करके पता कर सकते हैं. इनमें बड़ी शिकार होती हैं विदेशी महिला पर्यटक. उनके साथ छेड़खानी, लूटपाट, धमकाना यहां तक की रेप की ख़बरें भी आपको इंटरनेट पर मिल जाएंगी.    

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जो लोग ऐसा कर रहे हैं, क्या वो देश की बदनामी नहीं कर रहे. जिन भी विदेशी पर्यटकों का भारत आने का अनुभव अच्छा नहीं रहा, क्या वो हमारे देश के बारे में कुछ अच्छा कह पाएंगे? कहना तो दूर मैं मानता हूँ कि वो दोबारा भारत आना भी पसंद नहीं करेंगे.

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ये तो बात हुई विदेशी पर्यटकों के साथ हमारे व्यवहार की. अब अपनी बात भी कर लें. कुछ दिन पहले बाली के होटल का एक वीडियो वायरल हुआ था. उसमें एक भारतीय परिवार होटल का सामान चुराकर ले जाते दिखाया गया था. जिन्हें वक़्त रहते होटल मालिकों ने पकड़ लिया था. इसे देखने के बाद दुनियाभर में लोगों ने हम भारतीयों के बारे में क्या-क्या नहीं कहा - लालची, बुरे इंसान, आदत से मजबूर और न जाने क्या-क्या.

कई लोग वीडियो शेयर न करने की बात कर रहे थे, क्योंकि बाली में भारतीयों की बहुत ही इज्ज़त है पर इसके बाद वह छवि धूमिल हो गई. इस पर तुर्रा यह कि कुछ भारतीय यूट्यूब पर ऐसे वीडियो बना रहे थे कि हम होटल से क्या चुरा सकते हैं और क्या नहीं?

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सच में क्या यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र है? क्या इससे हमारे बारे में दुनियाभर में लोगों की खराब राय नहीं बनती. मुझे लगता है कि ये हो ही नहीं सकता कि देश में विदेशियों के साथ और विदेश में हमारा व्यवहार किसी भी तरह का असर न डाले. 


मुझे लगता है कि हमें ख़ुद को बदलने की ज़रूरत है वरना वो दिन दूर नहीं जब हमें पर्यटन विभाग की टैगलाइन पर गर्व नहीं शर्मिंदगी महसूस होगी.

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