रोटी (Roti)...जिसे लोग फुलका, चपाती वगैरह के नाम से भी बुलाते हैं. ये भारतीय खाने का मुख्य हिस्सा है. ख़ासतौर से उत्तर भारत में जहां गेहूं की पैदावार ज़्यादा है. इसकी अहमियत का अंदाज़ा हमारी कहावतों में भी मिल जाता है. मसलन, लोग कहते हैं फलाने गांव से हमारा 'रोटी-बेटी का रिश्ता' है. 

Roti
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मगर क्या आपने कभी सोचा है कि जिस रोटी का हमारे खाने में इतना महत्व है, वो हमारी थाली में कैसे पहुंची? मतलब कि उसकी उत्पति कैसे, कब और कहां हुई? अगर नहीं, तो चलिए पता लगाते हैं.

कोई फ़ारस तो कोई पूर्वी अफ़्रीका से मानता है रोटी की उत्पत्ति (Origin Of Roti)

रोटी (Roti) की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग थ्योरी हैं. कुछ लोग मानते हैं कि रोटी फ़ारस से आई थी. उस वक़्त ये थोड़ी मोटी और मैदे से बनी होती थी. जबकि गेहूं वाली रोटी की अगर बात की जाए, तो उसकी उत्पत्ति अवध रिसायत में मानी जाती है. इसका शेप कटोरीनुमा होता था और मैदे वाली रोटी की तुलना में पतली भी होती थी. 

History of roti
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हालांकि, कुछ लोग रोटी की उत्पत्ति पूर्वी अफ़्रीका से मानते हैं. यहां स्वाहिली बोलने वाले लोग फ़्लैट ब्रेड या रोटी का सेवन करते थे. कहा जाता है कि रोटी वहां से व्यापारिक मार्गों के ज़रिए दक्षिण एशियाई देशों में पहुंची. 

भारत के लिए नयी नहीं है रोटी

भले ही तमाम थ्योरी रोटी की उत्तपत्ति भारत के बाहर बताती हों, मगर ऐतिहासिक साक्ष्यों से मालूम पड़ता है कि रोटी से भारतीयों का रिश्ता बहुत पुराना है. इतना कि इसके निशान 3300-1700 ई. पू. हड़प्पा सभ्यता में भी मिलते हैं. उस वक़्त लोग गेहूं, बाजरा, जौ वगैहर उगाया करते थे. 

Origin of roti
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बता दें, रोटी (Roti) शब्द संस्कृत के शब्द 'रोटीका' से आया, जिसका ज़िक्र 16वीं शताब्दी में भरत मिश्रा द्वारा लिखित आयुर्वेद के ग्रन्थ, 'भावप्रकाश' में भी मिलता है. साथ ही, रामचरितमानस में तुलसीदास ने 1600 ईसापूर्व में कटोरी से मिलती-जुलती रोटी का वर्णन किया है. यहां तक 10वीं और 18वीं शताब्दी के बीच के कन्नड़ साहित्य में भी गेहूं से बनी रोटी का भी उल्लेख मिलता है. 

इसमें गूंदे आटे को आग के शोलों में दो प्लेट्स के बीच में सेंकने की बात कही गई, ये मुच्चाला रोटी बनाने की विधि है. वहीं किविचू रोटी को तवे पर सेंककर चीनी या खाने योग्य कपूर के साथ खाया जाता था. इसी तरह चुछू रोटी, सावुदू रोटी के बारे में भी लिखा गया है. इनमें से कई तरीकों का इस्तेमाल आज भी किया जाता है.

मुगल बादशाहों और स्वतंत्रता सेनानियों को भी पसंद थी रोटी

'आइन-ए-अकबरी' में भी रोटी का ज़िक्र मिलता है. अबुल-फ़ज़ल ने 16वीं शताब्दी के इस दस्तावेज़ में बताया है कि रोटी मुग़ल बादशाह अकबर के पसंदीदा खाने की चीज़ों मे से एक थी. अकबर को गेहूं की रोटी इतनी पसंद थी कि वो भी घी और चीनी के साथ इसे खाते थे. 

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यही नहीं, औरंगज़ेब भी रोटी खाना पसंद करता था. बताते हैं कि औरंगज़ेब ने फ़िट रहने के लिए शाकाहार चुन लिया था. उसी के शासनकाल में रोटियों का आकार हथेली जितना हुआ था. इससे भी दिलचस्प ये है कि 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम में रोटियों का इस्तेमाल स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा किया गया. उस दौरान अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ रोटी को स्वंतत्रता का पैगाम और राष्ट्रीय एकजुटता का चिह्न बना दिया गया था. इसे संदेश की तरह इस्तेमाल किया जाता था.

एक बात साफ़ है कि रोटी का इतिहास बहुत पुराना है. हालांकि, ये पहली बार किसने बनाई, इसका कोई पुख़्ता सुबूत नहीं है. मगर ये ज़रूर है कि एक बार में रोटी नहीं बनी थी, बल्कि लगातार लोगों ने अलग-अलग प्रयोग किए थे, जिसके बाद आज हमें रोटी का ऐसा रूप दिखता है. ख़ैर, किसी ने भी और कहीं भी बनाया हो, मगर रोटी वाक़ई खाने की एक बेहतरीन चीज़ है.