घड़ी की सूईयां धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हैं, घंटे सालों की तरह लग रहे हैं, मिनट घंटों की तरह लग रहे हैं और पल्खें झुकी हुई हैं. मन में बस एक ही बात चल रही है कि यार सब कुछ इतना ‘बोरिंग’ क्यों लग रहा है. ऐसे में हम बेताब हो जाते हैं कि कुछ भी, कैसे भी हो, इस बेहद उबाऊ समय से बस पीछा कैसे छुड़ाएं? 

आख़िर, हम बोर क्यों होते हैं? जो काम कर रहे हैं उससे असंतुष्ट क्यों हैं या मज़ा क्यों नहीं आ रहा है. काम करने का मन तो है मगर समझ नहीं आ रहा कहां से और कैसे शुरू करें? 

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मगर बोर होने को सही तरीक़े से परिभाषित करना शायद थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि ये सारी वजहें तो बस बाहरी हैं बोर होने की असल वजह कहीं भीतर हमारे दिमाग से भी जुड़ी हुई है. और हां, आपका मैथ्स क्लास में नींद आने की कोई ख़ास वजह ज़रूर है. 

हम इंसान हमेशा नई चीज़ जानते और सीखते रहते हैं. जब भी हम कोई नई चीज़ सीखते हैं तो शरीर में डोपामिन (Dopamine) नाम के एक रसायन का बेहद अधिक मात्रा में रिसाव होता है. 

इस रसायन का रिसाव कम उम्र में अधिक होता है तभी तो अपने देखा होगा कि बच्चे हर समय कुछ न कुछ पूछ रहे होते हैं. मगर जैसे ही हमें लगता है कि ये काम हमारे रूचि का नहीं है या इसमें हमें मज़ा नहीं आ रहा है तो इस डोपामिन का रिसाव कम होने लगता है और हम बोर होने लगते हैं. 

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ख़ैर, कई वैज्ञानिकों का ये भी मानना है कि बोर होना अच्छा होता है. वैज्ञानिकों के हिसाब से ये हमें मोटीवेट भी करता है, क्योंकि जब भी हम बोर होते हैं हम कुछ नया या कुछ अलग करना चाहते हैं जिसका नतीजा ज़्यादातर अच्छा ही होता है. 

कई रिसर्च का तो ये भी मानना है कि जो लोग ज़्यादा बोर होते हैं वो ज़्यादा क्रिएटिव होते हैं. 

आज के समय में लोगों के पास ख़ुद को व्यस्त रखने का कोई न कोई तरीक़ा ज़रूर है. ऐसे मैं साइंस का कहना है कि बोर होना ज़रूरी है.