चौराहों से लेकर घर के रेफ़्रिजरेटर तक, गर्मी के मौसम एक गहरे लाल रंग के पेय ने दक्षिण एशियाई देशों के घरों में जगह बनाई है.

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तुक्का तो लगा ही लिया होगा, ये बात है हमारी ज़िन्दगी में रसना और किसान स्कवॉश आने से पहले की. घर-घर में एक तेज़ ख़ुशबू वाला पेय मिलता था, जिसे पानी में मिलाकर पीते थे तो ऐसा लगता था मानो रूह को शांति मिल गई… ये था रूह अफ़ज़ा. 

इस पेय की ख़ासियत ही यही है कि या तो ये आपको बेहद पसंद आयेगा या बिल्कुल नहीं… और इसे नापसंद करने वालों की संख्या मुट्ठीभर है! 

आइए जानते हैं रूह अफ़ज़ा की कहानी. 

1. 1906 में हकीम अब्दुल मजीद ने पुरानी दिल्ली में ‘हमदर्द’ की स्थापना की, ये युनानी दवाई की एक दुकान थी. आज़ादी के बाद हकीम साहब का बड़ा बेटा दिल्ली में ही रहा और छोटा बेटा पाकिस्तान चला गया. 

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2. 1254 में आई पंडित दया शंकर मिश्र की किताब ‘मसनवी गुलज़ार-ए-नसीम’ से रूह अफ़ज़ा नाम लिया गया. इस किताब में फ़िरदौस की बेटी थीं, रूह अफ़ज़ा.  

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3. रूह अफ़ज़ा की बोतल में जो तस्वीर दिखती है उसे मिर्ज़ा नूर अहमद ने बनाया था.  

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4. रूह अफ़ज़ा बनाने में क्या-क्या लगता है ये एक रहस्य ही! एक साइट के मुताबिक़ इसमें गाजर, पालक, तरबूज़, स्ट्रॉबेरी, संतरा, रैस्पबेरी, चेरी, नींबू, गुलाब आदि होता है! हमदर्द की साइट और बोतल चेक करने पर भी असली सामान का पता नहीं चला 

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5. जब रूह अफ़ज़ा को दुनियावालों से मिलाया गया तब इसकी पैकिंग का कोई तरीक़ा नहीं था. पहले अलग आकार-प्रकार की शराब की पुरानी बोतलें यानि जो भी मिल जाए उसमें उस ‘सिरप’ को भरकर बेचा जाता था.  

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6. रूह अफ़ज़ा ही पहला शर्बत है जिसके लिए एक तरह की (750 ml) की सफ़ेद बोतलें मंगवाई गईं. शुरुआत में इसकी क़ीमत बहुत ज़्यादा थी.  

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7. आज रूह अफ़ज़ा का इस्तेमाल आईसक्रीम, फ़िरनी, कस्टर्ड, मिल्क शेक, फ़लुदा, लस्सी आदि बनाने में भी होता है.  

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