कासुंदी चटनी बंगाल के लोगों की फ़ेवरेट चटनी है. इसका नाम सुनते ही बंगालियों के चेहरे की ख़ुशी देखते ही बनती है. इस चटनी को सरसों के दानों से बनाया जाता है. आइए जानते हैं क्या ख़ास है इस चटनी में और कैसे बनी ये बंगालियों की ये फ़ेवरेट चटनी.

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पश्चिम बंगाल के हर घर और रेस्टोरेंट का हिस्सा बन चुकी है कासुंदी चटनी. वहां पर अगर खाने के साथ बासुंदी चटनी न परोसी जाए, तो लोग बुरा मान जाते हैं. आम लोगों में ये सरसों की चटनी के नाम से फ़ेमस है. इसकी ख़ुशबू नाक से चढ़कर सिर तक पहुंचती है.

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कासुंदी का इतिहास ज़मीदारी प्रथा से जुड़ा हुआ है. उस दौर में ये अमीर लोगों के घरों में ही बनाई जाती थी. इसे बनाने के नियम भी बहुत कड़े थे. इसे सिर्फ़ ब्राह्मण महिलाएं ही बना सकती थीं. वो ही इसके लिए सरसों के दानों को चुनती थीं.

20 साल तक ख़राब नहीं होती

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कासुंदी को पहले चटनी के तौर पर बनाया जाता था. इसे तब चावल और हरी मिर्च के साथ परोसा जाता था. इसे अचार की रानी भी कहा जाता है क्योंकि ये शाही भोजन का हिस्सा थी. कहते हैं कासुंदी को अगर ठीक से बनाया जाए, तो ये 20 साल तक ख़राब नहीं होती.

इससे जुड़ी परंपराएं भी बहुत कड़ी थी.

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कासुंदी बनाने का काम मानसून से ही शुरू हो जाता है. इसके लिए उम्दा क्वालिटी के सरसों के दाने चुने जाते हैं. इससे जुड़ी परंपराओं के बारे में रेणुका देवी चौधरानी द्वारा लिखित क़िताब 'स्त्री अचार' में विस्तार से लिखा गया है. इसमें बताया गया है कि कैसे दूसरी जाति कि महिलाओं को इसे बनाने से रोका जाता था.

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इसे सिर्फ़ ब्राह्मण महिलाएं ही बना सकती थीं. वो ही इसके लिए सरसों के दानों को चुनती थीं. फिर इसे सुखाती थीं और फिर उन्हें पीस कर उसे मिट्टी के बर्तन में रखती थीं. इससे जुड़े नियम इतने कठोर थे कि अगर कोई तय समय में कासुंदी बनाने में विफ़ल हो जाती थी, तो उसे अगले 12 साल तक इसे बनाने की अनुमति नहीं होती थी.

विधवा महिलाओं को भी इसे बनाने की इज़ाज़त नहीं थी. यही नहीं जिस घर में किसी बच्चे का जन्म हुआ होता या फिर किसी की मौत हो जाती तो उन्हें 1 महीने तक कासुंदी बनाने की अनुमति नहीं होती थी.

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जमींदारी प्रथा के ख़त्म होने के बाद ये आम लोगों के घर में भी बनाई जाने लगी और धीरे-धीरे ये बंगाली व्यंजन का प्रमुख हिस्सा बन गई.

अगर आपने अभी तक इस स्वादिष्ट चटनी का स्वाद नहीं चखा है, तो एक बार इसे ज़रूर ट्राई करना.

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