छोटे थे तो कॉपियों में लिखने का बड़ा शौक़ होता था. नई-नई कॉपी-क़िताबों पर जिल्द चढ़ाना, नए -नए पन्नों की ख़ुशबू  उनपर बेहद ख़ूबसूरती से लिखना. 

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लिखते समय मार्जिन (Margin) का बड़ा ध्यान देना पड़ता था. उससे बाहर निकला नहीं की सिर पर टप्पा पड़ा. इससे पहले आप और बचपन की यादों में खो जाएं मैं आपको यहीं रोकती हूं. अब ज़रा मेरे एक प्रश्न का उत्तर तो दीजिए कि ये मार्जिन क्यों बनी हैं? ताकि हमारा काम साफ़-सुथरा दिखे. यदि आपका भी जवाब  यही है तो आप ग़लत है. 

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पुराने समय में सभी ज़रूरी चीज़ें कागज़ पर ही होती थीं. अधिकतर ऐसा होता था कि चूहे किनारे खा जाते थे  जिसकी वजह से काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता था. इस समस्या से निजात पाने के लिए कॉपियों में ये लाल रंग की मार्जिन बन कर आने लगी. ताकि चूहे किनारा खा भी जाएं तो भी नुकसान न हो. 

अब ज़रा, नोटबुक के इतिहास के बारे में कुछ जान लेते हैं.  

अब ज़रा, नोटबुक के इतिहास के बारे में कुछ जान लेते हैं. ये तो शायद आपको पता होगा कि कागज़ की शुरुआत चीन से 100 BC के दौरान शुरू हुई थी. 1860 के दौरान नोटबुक की रचना फ़्रांस और जर्मनी जैसे देशो में हुई थी. इसके बाद, 1888 में 24 वर्षीय पेपर मिल वर्कर थॉमस डब्ल्यू होली ने पहला कानूनी पैड बनाया था. धीरे-धीरे नोटबुक में कई बदलाव आते गए और आज वो हर रूप, रंग, आकार की आपको मार्केट में मिल जाएगी. 

अब आपको ये ज्ञानकारी पता है तो बस आगे चिपका दो !!