कहते हैं डर सभी को लगता है. बहादुर से बहादुर व्यक्ति भी किसी न किसी चीज़ से डरता ही है. मगर फिर भी लोग अक्सर ये कहते पाए जाते हैं कि उन्हें किसी भी चीज़ का ख़ौफ़ नहीं है. हालांकि, अगर उनकी बात पर यक़ीन कर भी लिया जाए, तो ये उनकी ताक़त नहीं, बल्कि कमज़ोरी है.

Fearless people
Source: cnet

जी हां, किसी भी चीज़ का ख़ौफ़ न होना एक तरह की आनुवांशिक बीमारी है. दरअसल, इस समस्या से पीड़ित लोगों के दिमाग़ का वो हिस्सा काम ही नहीं करता, जिससे डर का पता चलता है. ऐसे लोगों को अपने सामने मौजूद ख़तरे का आभास नहीं होता, जिसके चलते वो ख़ुद की सुरक्षा भी नहीं कर पाते.

ये भी पढ़ें: अंतरिक्ष में इंसान के शरीर में होते हैं ये 8 बड़े बदलाव, एक आम इंसान तो इन्हें झेल ही नहीं सकता

इस बीमारी में मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पाता डर का संदेश

सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि हमें डर का एहसास कैसे होता है. दरअसल, जब भी हमारे सामने कोई अनचाही परिस्थिति आती है, तब हमारे शरीर की तंत्रिकाएं मस्तिष्क के एक हिस्से Amygdala तक संदेश पहुंचाती हैं. ये हमारे मस्तिष्क में 'भागने या लड़ाई' करने की प्रतिक्रिया को उत्तेजित करता है. मगर जो लोग Urbach-Wiethe disease से ग्रसित होते हैं, उनके साथ ऐसा नहीं होता. 

Amygdala
Source: interestingpsychology

इस आनुवांशिक बीमारी में शरीर के कई हिस्से काफ़ी सख़्त हो जाते हैं, जिसका असर दिमाग़ पर भी पड़ता है. मस्तिष्क में एमिग्डेला नाम का हिस्सा इतना कड़ा हो जाता है कि इस तक तंत्रिकाओं के ज़रिए डर का संदेश नहीं पहुंच पाता है. दिलचस्प ये है कि इस बीमारी का असर बच्चे के विकास पर नहीं पड़ता. मतलब है कि उसे इस बीमारी के चलते कोई और समस्या नहीं होती, बस उसे डर का एहसास नहीं होता है.

इस बीमारी से पीड़ित एक महिला पर हुए थे चौंकाने वाले प्रयोग

अमेरिका में एक महिला इसी बीमारी से पीड़ित थी. जिसकी पहचान ज़ाहिर नहीं की गई और उसे SM नाम दिया गया. डॉक्टरों ने उस पर कई तरह के प्रयोग किए. उसका चुपके से अपहरण किया, लेकिन वो न तो चीखी और न ही उसने किसी से मदद की गुहार लगाई. बंदूक से उसे डराने की कोशिश भी बेकार गई. यहां तक, जब उसके कमरे में ज़हरीले सांप छोड़ दिए गए, तो भी वो घबराने के बजाय सांपो को छूने के लिए आगे बढ़ गई. जिसके बाद तुरंत सांपों को वहां से हटाना पड़ा. 

snakes
Source: extra

बता दें, इस महिला पर क़रीब 10 साल प्रयोग हुए, जिसके बाद ये साबित हो गया कि दिमाग़ का एक हिस्सा प्रभावित होने की वजह से उस महिला को किसी भी प्रकार का डर नहीं लगता. हालांकि, इसका एक अपवाद भी रहा. दरअसल, जब SM को अपनी ही तरह की बीमारी से पीड़ित दो अन्य लोगों के साथ एक कमरे में कार्बन डाइऑक्साइड में सांस लेने के लिए छोड़ा गया, तब पहली बार SM को डर का एहसास हुआ. ऑक्सीज़न के अभाव में उनमें पैनिक देखा गया.

शोधकर्ताओं ने पाया कि अब तक जो डराने वाले प्रयोग किए गए थे, उसमें सांप हो या बंदूक बाहरी चीज़ों का इस्तेमाल किया गया था, जिसमें डर का संदेश एमिग्डेला तक नहीं पहुंच पाया. मगर जब सांस लेने में परेशानी हुई तो ये शरीर के अंदर से आई प्रतिक्रिया थी. इसका सीधा मतलब था कि जब हमारे शरीर में ऑक्सीज़न की कमी होती है, तब हमारा शरीर इसका पता लगाने के लिए एमिग्डेला के भरोसे नहीं बैठता. इस बजाय शरीर के अन्य हिस्से सक्रिय होते हैं. 

क्या होते हैं इस बीमारी के लक्षण?

Urbach-Wiethe disease
Source: hellenicdermatlas

इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति में तीन मुख्य लक्षण देखे गए हैं. जिसमें आवाज़ में भारीपन आना, आंखों के आसापास उभरे हुए दाने और दिमाग़ में कैल्शियम इकट्टठा होना. मुख्य रूप से ये कैल्शियम ही है, जो डर को ख़त्म कर देता है. हालांकि, इसका पता सीटी स्कैन के ज़रिए ही लगाया जा सकता है. साथ ही, ये एक इंसान के विकास पर तो कोई असर नहीं डालता, लेकिन आगे चलकर इसके मरीज़ को मिरगी आ सकती है. बता दें, पूरी दुनिया में इस बीमारी से पीड़ित लोगों के संख्या 500 से भी कम है.