ज़िन्दगी हर क़दम एक नई जंग है. कुछ लोगों की ये जंग आलीशान कमरों से शुरू होती है, तो कुछ लोगों की टपकती छत वाले 4/4 कमरों से. एक ऐसी ही झुग्गी-झोपड़ी में आंखें खोली थीं इंदौर के रहने वाले पहलवान सनी जाधव ने. अगर आपके अंदर जोश और जज़्बा है तो आप हर मुक़ाम हासिल सकते हैं. जोश और जज़्बे से भरी ऐसी ही एक कहानी सनी जाधव की भी है.

आज भी रहते हैं झुग्गी में 

Free Press Journal के एक लेख के अनुसार, खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स मेडलिस्ट पहलवान सनी जाधव आज भी इंदौर की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं. इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए जाधव ने कभी चाय-बिस्कुट खाकर दिन गुज़ारे तो कभी भूखे पेट ही सोए.

Source: New Indian Express

पिता के गुज़रने के बाद किए छोटे-मोटे काम 

बता दें कि जुलाई 2017 में सनी के पिता की Brain Haemorrhage से मौत हो गई थी. इसके बाद उन्होंने रोज़ी-रोटी के लिए लोगों की गाड़ियां साफ़ करने से कुली का काम भी किया. सुबह काम करके जाधव को 150 रुपये मिलते थे. काम के बाद वो ट्रेनिंग करते थे. 

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 7 नेशनल मेडल हासिल कर चुके जाधव ने रेलवे में मज़दूरी भी की. जब जाधव के पिता जीवित थे तब वोदिन के 500-600 रुपये कमाते. जाधव के पिता के गुज़रने के बाद उन पर परिवार की ज़िम्मेदारी आ गई.

मैं छोट-मोटे काम करता और मेरी मां दिन में डे केयर सेन्टर पर काम करती. मैने कई दिन भूखे रहकर गुज़ारे. 

                    - सनी जाधव

पहलवानी का तरीका बदलने के बाद पलटी क़िस्मत 

कॉलेज में पढ़ने वाले जाधव, राष्ट्रीय स्तर पर सीनियर लेवल पहलवान रह चुके हैं. फ़्री स्टाइल पहलवान जाधव ने Greco Roman स्टाइल अपनाया और उनकी क़िस्मत पलटी. बीते शनिवार को शुरू हुए नेशनल Greco Roman स्टाइल पहलवानी चैंपियनशिप में जाधव ने 60 किलोग्राम वर्ग में हिस्सा लेकर ये साबित कर दिया कि मेहनत और कड़ी लगन से इंसान कहीं भी पुहंच सकता है.

Source: Dainik Bhaskar

खेल मंत्रालय से मिली मदद 

जाधव को खेल मंत्रालय से 2.5 लाख रुपये की मदद मिली. पैसे मिलने के बाद उन्होंने कोच समेत कई लोगों को उधार वापस किया. जाधव ने ये भी बताया कि कर्ज़ की रक़म काफ़ी बढ़ गई थी और इस वजह से भी उन्हें चिंता रहती थी. जाधव ने बची रक़म ख़ुद के डायट और सप्लीमेंट पर ख़र्च करेंगे.  

पिता की मृत्य के बाद छोड़ने वाले थे पहलवानी 

कॉमनवेल्थ गेम्स पदक विजेता, पहलवान कृपा शंकर पटेल ने भी जाधव की आर्थिक मदद की. पटेल ने बताया कि पिता की मृत्यु के बाद जाधव ने पहलवानी छोड़ने का मन बना लिया था. राष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल जीत चुके जाधव को सीनियर खिलाड़ियों और कोच ने पहलवानी न छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया. पटेल ने ये भी कहा कि अगर कोई पहलवान रोटी प्याज़ खाकर सिल्वर मेडल ला सकता है तो उसमें ज़रूर प्रतिभा होगी.  

जाधव की कहानी बेहद प्रेरणादायक है. इससे ये साबित होता है कि अगर आप में सच्ची लगन है तो आप सफ़लता हासिल कर ही लेते हैं. और जो ख़ुद की मदद करता है उसे मदद मिल ही जाती है.