आज से  लगभग 10,000 साल पहले जब मानव जाति पृथ्वी पर अपना घर बसाना शुरू ही कर रही थी, किसी को नहीं पता था कि आने वाले समय में यही जाति धीरे- धीरे इस पृथ्वी को निगल जाएगी. उस समय मनुष्यों की संख्या 1 मिलियन से 15 मिलियन के बीच आंकी गई थी, वहीं आज वो लगभग 8 बिलियन पहुंच गई है! मानव ने अपना इतना विकास कर लिया कि इस धरती पर बाक़ी जीव-जंतु और प्रकृति के लिए न मात्र छोड़ा है.  

पिछले मात्र 50 साल में ही वन्य-जीवों में 60% की गिरावट आई है. मानवता के इतिहास में पहली बार ऐसा है कि प्रकृति की स्थिरता को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता है. जंगल, समुद्र, सागर और इन सब के जीवों की ज़िंदगी अकेले इंसानों ने मिलकर तबाह कर दी है, परिणाम स्वरूप हम कठोर जलवायु परिवर्तन, बढ़ती प्राकृतिक आपदा देख रहे हैं और प्रकृति के कामकाज में भारी असंतुलन आ गया है. जिसको हम अगर आज भी भरना शुरू करेंगे तो भी कई सदियां बीत जाएंगी.   

Netflix पर एक Documentary Series है Our Planet जिस में बड़े ही विस्तार में समझाया गया है कि इंसानों को क्यों थमने की ज़रूरत है? इसलिए कुछ तथ्य और तस्वीरों के ज़रिए अब ये समझना बहुत ज़रूरी है कि हम ने क्या किया है.

अंटार्कटिका हमारी पृथ्वी का सबसे दक्षिणी छोर है. यह भूमि की सबसे ठंडी जगह भी है. यह पिछले 30 मिलियन सालों से जमा हुआ है. यह इतना ठंडा है कि हर साल 19 मिलियन वर्ग किलोमीटर महासागर जम जाता है. मगर पिछले कुछ सालों में पृथ्वी के बढ़ते तापमान की वजह से बर्फ़ तेज़ी से पिघलती जा रही है. जो किसी के लिए भी लाभदायक नहीं है. यह बर्फ़ की चादर सूर्य से आने वाले हानिकारक किरणों से बचाती है मगर इसके तेज़ी से पिघलने की वजह से हम अपनी यह सुरक्षा कवच खोते जा रहे हैं. 

environmental damage

अंटार्टिका में कभी- कभी पाए जाने वाले Gentoo Penguins आजकल अक्सर दिखाई देने लगे हैं. यह पानी में सभी पेंगुइनों में सबसे तेज़ हैं. वह अंटार्टिका के उन हिस्सों में अधिक संख्या में हो गए हैं जो कभी इन पक्षियों के लिए बहुत बर्फीले थे.  

Our planet

ध्रुवीय क्षेत्रों में समुद्री तापमान बढ़ने की वजह से बर्फ़ देर से जमती है और परत भी पतली रह जाती है. जो वहां के प्राकृतिक जानवर जैसे ध्रुवीय भालू (Polar Bear) के लिए एक बड़ी मुश्किल की बात है. यह भालू समुद्री बर्फ़ पर अपने खाने- पीने पर निर्भर होते हैं. बर्फ़ की परत आने के बाद उस बर्फ़ीले समुद्र के पानी मेंरह रहे जीव- जंतु इन भालुओं का भोजन होते हैं. खाना न मिलने की वजह से वह अभी से ही कुपोषित हो रहे हैं. यदि बर्फ़ जमेगी ही नहीं तो इससे पूरी खाद्य श्रृंखला पर असर पड़ेगा और यह ध्रुवी भालू धीरे- धीरे विलुप्त हो जाएंगे.  

Environment

समुद्री बर्फ़ पृथ्वी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यह पूरी पृथ्वी का जलवायु निर्धारित करने में एक अहम भूमिका निभाती है. जमी हुई सफ़ेद बर्फ़ सूरज की ऊर्जा को अंतरिक्ष में वापस प्रतिबिंब (Reflect) करती है जो कि धरती को ठंडा बनाए रखती है. वहीं, पिघली हुई बर्फ़ सूरज की ऊर्जा को 90% तक अपने अंदर सोख लेती है जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ जाता है. कई हज़ार वर्षों तक, समुद्री बर्फ़ में एक संतुलन था जो कि अब बिलकुल नहीं रह गया है. आज गर्मियों के दौरान 1980 की तुलना में 40% कम समुद्री बर्फ का आवरण है.  

Climate changes

दक्षिण - पूर्व एशिया में Borneo के जंगल 130 मिलियन साल पुराने हैं. जो कि इन्हें पृथ्वी का सबसे पुराना जंगल बनाता है. इस जंगल में चुने के पत्थर के बड़े- बड़े पहाड़ की चोटियां बनी हुई हैं. दुनिया के इस सबसे पुराने वर्षा वन में कुछ ऐसे वनस्पति और जीव पाए जाते हैं जो आपको कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे. विविधता में इतना समृद्ध होने के बावजूद Borneo के जुगल तेज़ी से ख़त्म होने की राह पर है. पिछले 50 सालों में Borneo ने अपना आधा जंगल इंसानों की स्वार्थी ज़रूरतों के चलते खो दिया है. 

Nature

समुद्र की भूमि पर पाई जाने वाली Coral Reefs सम्पूर्ण समुद्री गृह तल का 1% बनाती हैं फिर भी वह सभी समुद्री जानवरों के एक चौथाई के लिए घर हैं. यह Reefs समुद्र में वो खाने और रहने के लिए वो ढांचा बनाती हैं जो समुद्री जन-जीव के लिए बेहद ज़रूरी है. पिछले कुछ सालों से बढ़ते समुद्री तापमान की वजह से यह Coral Reefs ख़तरे पर हैं. इन Coral Reefs के अंदर इंसानों आंखों से न दिखाई देने वाले पौधे रहते हैं जिनसे इन्हें इनका रंग और पोषण दोनों मिलता है. मगर तापमान में 1- 2% की भी तेज़ी होते ही Corals अपने इन पौधे साथियों को निकाल देती हैं. जिसकी वजह से न केवल उनका रंग बल्कि खाना भी छिन जाता है. आने वाले समय में यदि समुद्री तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो न केवल Coral मरेंगी बल्कि उनके साथ- साथ समुद्री परितंत्र (Ecosystem) भी मर जाएगा. दुनियाभर में आधे Coral Reefs पहले ही मर चुके हैं.  

Human impacts on environment

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ये ऊपर की तस्वीरें और बातें तो मात्र एक बेहद छोटी सी झलक है इस बड़ी सी त्रासदी की जो हर वक़्त हमारी प्रकृति और वन्य जीवों के साथ घट रही है. यहां एक इंसान का घर बन रहा है तो उधर इन बेज़ुबानों की पूरी बस्ती तबाह हो रही है. अगर ये सब ऐसे ही चलता रहा तो यह पृथ्वी कितने लंबे समय तक और टिकी रहेगी? कब होगा जब आधुनिकता और स्थिरता की खाई भरेगी? अगर अभी नहीं तो कल भी नहीं.