लखनऊ के ‘बड़े इमामबाड़े’ से तो हर कोई वाकिफ़ है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शहर में इसके अलावा भी 5 अन्य 'इमामबाड़े' मौजूद हैं. इमामबाड़ा एक ऐसा धार्मिक स्थल होता है, जहां शिया संप्रदाय के मुसलमान इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की ‘मजलिस’ (शोक सभाएं) के लिए इकट्ठा होते हैं.

ऐसे में इन इमामबाड़ों का महत्व ऐतिहासिक के साथ-साथ धार्मिक भी है. तो चलिए फिर आपको बड़े इमामबाड़े समेत शहर के अन्य इमामबाड़ों की सैर कराते हैं. 

1. आसिफ़ी इमामबाड़ा या बड़ा इमामबाड़ा

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सबसे पहले 'बड़ा इमामबाड़ा' की बात कर लेते हैं. ये किसी परिचय का मोहताज नहीं है. ये एक तरह से लखनऊ की पहचान बन चुका है. नवाब आसिफ उद्दौला ने सन् 1784 में अकाल राहत परियोजना के अन्तर्गत इसे बनवाया था, ताकि यहां लोग काम करके कुछ पैसा कमा सकें. इसके चलते ही ये कहावत बनी कि ‘जिसे न दे मौला, उसे दे आसफ़ुउद्दौला’

आधुनिक निर्माण तकनीकों के उपयोग के बिना 200 साल पहले इमामबाड़े के मुख्य हॉल के ऊपर का ‘भूलभुलैया’ का निर्माण हुआ था. इसमें लोग रास्ता भटक जाते हैं, इसिलए अब यहां की सैर करने वाले केवल गाइड के साथ ही इसके अंदर जाते हैं. इसके साथ ही इमामबाड़े के परिसर में एक ‘आस़फी मस्जिद’ भी है, जहां मुस्लिम समाज के लोग प्रार्थना करते हैं. परिसर के बाएं छोर पर ‘शाही बावली’ है. कहते हैं कि इस शाही सीढ़ीनुमा कुंए में खज़ाने की चाबी और नक्शा छिपा है.

स्थान: रूमी गेट से पहले हुसैनाबाद रोड.

2. छोटा इमामबाड़ा

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इसे इमामबाड़ा हुसैनाबाद मुबारक के रूप में भी जाना जाता है. 1837 में इसका निर्माण मोहम्मद आली शाह ने करवाया था. ये बड़े इमामबाड़े के मुक़ाबले में छोटा है और टूरिस्ट भी यहां कम ही आते है. इसलिए इस जगह पर आपको काफ़ी शांति मिलेगी. मुख्य द्वार से इमामबाड़ा की सीढ़ियों तक एक धारा चलती है, जिसके दोनों ओर पूरी तरह से मैनीक्योर किए गए लॉन हैं.

छोटे इमामबाड़े का सबसे बड़ा आकर्षण है, इस भवन में सजे हुए बेल्जियम कांच की क़ीमती झाड़ फ़ानूस, कंदीलें, दीवारगीरियां और शमादान. इमामबाड़े पर कमरखीदार सुनहरा गुम्बद है, जिसके बुर्जों की ख़ूबसूरती देखते बनती है. इसके शिखर पर अर्द्धचंद्र की गोद में उगता सूरज है, जो लखनऊ का प्राचीन चिन्ह माना जाता है. इमामबाड़े के अंदर की मेहराबों पर कुरान की आयतें लिखीं हैं. 

स्थान: रूमी गेट से आगे हुसैनाबाद रोड

3. शाहनजफ़ इमामबाड़ा

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सिकंदरबाग के पास गोमती नदी के तट पर स्थित इस सफ़ेद गुंबद वाले मकबरे का निर्माण अवध के नवाब और पहले राजा ‘गाज़ी-उद-दीन हैदर’ ने इस्लाम के पैगंबर हज़रत मोहम्मद के दामाद हज़रत अली की याद में 1816-1817 में कराया था. मुख्य दरवाज़े से इमामबाड़े के दरवाज़े तक का रास्ता सफ़ेद संगमरमर से बना है. प्रमुख रूप से इसकी बनावट में लाखौरी ईंटों और बादामी चूने का प्रयोग किया गया है.

इस इमामबाड़े की खास विशेषता ये है कि, इसकी इमारत, इराक के नज्‍जाफ़ शहर में स्थित इमाम हज़रत अली की कब्र से काफ़ी मिलती-जुलती है. यहां गाज़ी-उद-दीन हैदर के अलावा उनकी तीन पत्नियों सरफ़राज महल, मुबारक महल और मुमताज़ महल की भी कब्रें हैं.

स्थान: शाहनाज़फ रोड, सहारागंज मॉल के अपोसिट

4. सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा

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इसे ‘मकबरा नवाब अमजद अली शाह’ के नाम से भी जाना जाता है. 1847 में नवाब वाजिद अली शाह ने इसे बनवाया था. शहर के बीचों-बीच ऐतिहासिक हज़रतगंज बाज़ार में स्थित सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा देखने में छोटा है और इसका डिज़ाइन भी अन्य इमामबाड़ों की तुलना में बहुत ख़ास नहीं है. लेकिन इसके बाद भी इसे निहारना बेहद अच्छा फ़ील देता है.

इसके अंदर दो छोटे कक्ष हैं और पांच मेहराबों के साथ एक बड़ा हॉल मौजूद है. हॉल के अंदर एक उठा हुआ मंच या शाहनशीं है, जहां पूरे साल ताज़िया रखी जाती हैं. 

स्थान: कैपर रोड, लालबाग़.

5. काला इमामबाड़ा

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नवाब आसिफ़ उद दौला के शासनकाल में सन 1700 में बना ये इमामबाड़ा पुराने लखनऊ में स्थित है, इस इमारत का रंग काला होने की वजह से इसे ‘काला इमामबाड़ा’ ‘काजल की कोठरी’ भी कहा जाता है. इसकी ख़ासियत ये है कि ये मस्जिद, इमामबाड़ा और दरगाह तीनों है. हुसैनाबाद रोड स्थित इस इमामबाड़े को मोहर्रम के समय ही खोला जाता है,

स्थान: दौलतगंज.

तो अगली बार जब आप लखनऊ में इमामबाड़ा देखने जाएं, तो लिस्ट में बड़ा इमामबाड़ा समेत इन पांचों को भी शामिल करें.

Source: Nowlucknow