चाहे छोटा सा बच्चा हो या कोई बड़ा व्यक्ति, हर कोई हर समय ये क्या है?, ये क्यों है?, ये ऐसे क्यों होता है? करता रहता है. हर किसी को अपने-अपने 'क्या, क्यों, कौन, कैसे' का जवाब चाहिए होता है. हम इंसानों के अंदर जिज्ञासा आदिकाल से ही रही है. पहियों का अविष्कार भी तो एक जिज्ञासा का ही फल है.

कुछ खोजने, जानने और समझने की इंसानों की इस ही भूख ने इतिहास में कई बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धियां दर्ज करवाई हैं.

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हम इंसना इतने जिज्ञासु होते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता है कि किस तरह हमारी रोज़ मर्रा की चीज़ें भी जुड़ी हैं हमारी जिज्ञासा से. जैसे कि अख़बारों में न्यूज़ या लोगों के बारे में पढ़ना जिनसे शायद हमारा कोई लेना-देना ही न हो, कई बार ऐसी चीज़ों या विषयों के बारे में जानना जिन को हम कभी भी निजी ज़िंदगी में लागू भी न करें, दो अंजान लोगो के बीच हो रही बात को चुपके-चुपके सुनना या भले ही किसी नई जगह पर जाना. हमें बस हर चीज़ के बारे में जानना होता है भले ही वो हमारे काम की हो या न हो.

मगर एक बात ये भी है कि जानकारी लेना और जिज्ञासु होने में थोड़ा सा फ़र्क़ ज़रूर है. यदि आप किसी बाहरी कारण की वजह से किसी सवाल का जवाब जानना चाहते हैं तो जैसे स्कूल या दफ़्तर तो आप जिज्ञासु नहीं हो. मगर आप चीज़ें इसलिए जानना और समझना चाहते हैं क्योंकि आप का अंदर से मन है तो आप बेशक जिज्ञासु हैं.

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इंसानी दिमाग़, जिज्ञासा को एक ख़ुशी की तरह देखती है. ये बिलकुल ऐसा है जब आप अपना पसंदीदा कुछ खाते है तो आपको कितना अच्छा महसूस होता है. जैसे ही हम कोई नई जानकारी पाते हैं तो हमारे दिमाग़ में डोपामिन (Dopamine) नाम का एक रसायन का रिसाव होता है जो हमे अच्छा महसूस करवाता है.

डोपामाइन रसायन के अतिरिक्त दिमाग़ के बाकी हिस्से भी एक अहम भूमिका निभाते है. साइंटिस्ट का कहना है कि, हमारी यादाश संभालने वाला हिस्सा प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स इस बात का ध्यान रखता है कि हम लगातार नई जानकारी ले रहे हैं या पुरानी ही. आख़िरकार, तभी तो हमें पता चलेगा कि हमें ये जानकारी लेनी चाहिए या नहीं.

आपने ये भी देखा होगा कि कुछ लोग ज़्यादा जिज्ञासु होते हैं तो कुछ लोग कम. ख़ैर, रिसर्च करने वालों का मानना है कि इसका दिमाग़ से कोई ख़ास काम नहीं है बल्कि ये हमारे बचपन या पलने-बढ़ने पर निर्भर करता है.