मेरे परिवार और दोस्तों का कहना है कि मुझसे ज़्यादा आलसी इंसान उन्होंने नहीं देखा.

सच बताऊं तो मुझे भी लगता है कि मैं बहुत आलसी हूं. ऐसा नहीं है कि मैंने इसके बारे में कुछ नहीं किया है. मैं बहुत कोशिश करती हूं कि अपना ये आलसपन ख़त्म कर दूं. मगर नहीं हो पाता है.

दिलचस्प बात ये है कि मैं तो क्या कोई भी आलसी नहीं रहना चाहता. हम सब अपना आलसपन हटाने के लिए यूट्यूब पर तर-तरह की मोटिवेशनल वीडियोज़ देखते हैं. रोज़ सोचते हैं कि बस आज तो मैं अपना सारा बचा हुआ काम ख़त्म कर ही दूंगी. आज कोई आलसपन नहीं. मगर, अगले दिन हमेशा की तरह वही होता है.

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Source: nypost

मगर आपको ये जान कर ख़ुशी होगी कि हमारा शरीर आलसपन के लिए पहले से ही बना है!

यहां तक की हम जब भी अपने शरीर को किसी भी तरह चलाने कि कोशिश करते हैं तो स्वाभाविक रूप से दिमाग़ इस तरह काम करता है कि कम से कम कैलोरी ख़र्च हो. यदि आप एक्सरसाइज़ भी करते हैं तब भी शरीर इसी तरह काम करता है कि कम से कम शरीर की ऊर्जा ख़र्च हो.

हालांकि, साइंटिस्ट का ये भी कहना है कि डोपामाइन (Dopamine) नाम का रसायन जो कि हमें मोटीवेट करता है दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह से काम करता है.

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दिमाग़ के कुछ हिस्सों में जहां डोपामाइन हमें काम करने के लिए प्रेरित करता है वहीं दिमाग़ के कुछ हिस्सों में यही डोपामाइन हमारे आलसपन को हवा देता है.

अगर आज छुट्टी का दिन है और मुझे बचा हुआ काम या दिन भर बिस्तर पर पड़े रहने में से कुछ चुनना हो तो हमारा दिमाग स्वाभिक रूप से आराम को चुनता है. डोपामाइन का असर दिमाग़ के दूसरे हिस्से पर इतना कि भले ही हमें इस काम के रुपये क्यों न मिल रहे हों हमारा दिमाग़ अपनी ऊर्जा को बचाने की तरफ ही क़दम लेगा.

तो ये हम नहीं हमारा दिमाग़ है जो कि आलसी है. हम तो काम करना चाहते हैं.