अक्सर आपने बड़े-बुजुर्गों को बोलते हुए सुना होगा कि ‘लालच बुरी बला है'. जब हम किसी चीज़ को लेकर लालची हो जाते हैं तो हमारे अंदर सही-ग़लत की पहचान भी ख़त्म हो जाती है. ये ज़रूरी नहीं हमारे अंदर लालच केवल धन या दौलत का ही हो बल्कि, कभी-कभी ये लालच हमारे अंदर सम्मान, प्रतिष्ठा, सुंदरता या किसी भी प्रकार के बाहरी आडंबरों का भी हो सकता है.

अब आप ख़ुद देखिए कि जब बच्चा छोटा होता है, तो उसके मन में लालच की भावना नहीं होती है क्योंकि उसके पास जितना है, वह उतने में ही ख़ुश और संतुष्ट है.

परन्तु जैसे-जैसे वो बड़ा होता जाता है उसे हमेशा ज़्यादा चाहिए होता है. उसके पास जो है अब उसे वो देख कर संतुष्टि नहीं मिलती है. क्योंकि हम बचपन से ही उसको ये बोलना शुरू कर देते हैं कि अगर इतने अंक लेकर आओगे तो ये होगा, ऐसा करोगे तो उसकी कमी पूरी होगी. हमने कभी संतुष्ट होना नहीं सिखाया बल्कि हमेशा ही ज़्यादा, ज़्यादा और और ज़्यादा की आदत डाली है.

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इस लालच के पीछे एक बहुत बड़ा बायोलॉजिकल कारण भी है.

लालच हमारे दिमाग़ के रसायनों का खेल है. हमारे लालच को जो रसायन बढ़ावा देता है वो है डोपामाइन. डोपामाइन एक ऐसा रसायन है जो शरीर में सिग्नल्स पहुंचाता है. इंसान जब किसी बात या चीज़ से अच्छा महसूस करता है तब डोपामाइन का रिसाव होता है. जितना ज़्यादा डोपामाइन का रिसाव उतना ही अच्छा महसूस होता है.

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जब लोग ड्रग्स का नशा करते हरते हैं तब इसी रसायन का रिसाव बेहद ही अधिक मात्रा में होता है, जिसकी वजह से उनका बार-बार इसे लेने का मन करता है. ठीक इसी तरह जब हम एक बार पैसा, प्रतिष्ठा, सम्मान आदि चीज़ें महसूस करते हैं, तब शरीर में डोपामाइन का रिसाव होता है जिसकी वजह से हमें ये और पाने की इच्छा होती है.

ये सारी चीज़ें पाकर हमें ख़ुशी का भाव महसूस होता है तो दिमाग़ को पता नहीं चलता कि ये सही है या नहीं. ऐसे में दिमाग़ का लॉजिकल भाग को प्रयोग में लाने की आवश्यकता होती है ताकि हमें इस बात का एहसास रहे है कि हम जो भी चीज़ चाह रहे हैं उसकी हमें आवश्यकता है भी या नहीं.