आप एक इंटरव्यू के लिए जा रहे हैं. आप पूरी तैयारी के साथ हैं. मगर इंटरव्यू में जाने से पहले आपके दिमाग़ में अचानक से एक ख़्याल आता है कि क्या हुआ होगा अगर मुझे ये जॉब नहीं मिली? अगर मैं समय से नहीं पहुंचा तो? अगर मैं उनके किसी सवाल का ज़वाब नहीं दे पाया तो? अगर मेरे से किसी बेहतर व्यक्ति ने पहले इंटरव्यू दे दिया तो?

आप देखेंगे कि चंद मिनटों में आपका पूरा दिमाग़ तरह-तरह के ख्यालों से भर जाएगा. कुछ सवाल तो ऐसे होंगे जिनका कोई सिर-पैर नहीं नहीं होगा. आप बस हर चीज़ ख़ुद ही ज़्यादा सोचने लग जाते हैं. शायद हम इसलिए भी ज़्यादा सोचते हैं क्योंकि हमें अपने हर सवाल का जवाब तुरंत ही चाहिए होता है. हमें हर चीज़ पर क़ाबू पाना अच्छा जो लगता है.

मन में एक साथ बहुत सारे ख़्याल होने की वज़ह से लोग अक्सर ज़्यादा सोचा करते हैं. ओवर थिंकिंग या फ़िज़ूल में ज़्यादा सोचना एक कष्ट की तरह है. अपने दिमाग़ में क़ैद हो जाने जैसा कुछ.

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जब भी हमें लगता है कि कोई चीज़ हमारे बस में नहीं है तो मन में तुरंत एक डर पैदा हो जाता है क्योंकि हम इंसानों को हर चीज़ पर कंट्रोल रखना पसंद है. ऐसे में दिमाग़ का एमिग्लाडा हिस्सा एक्टिवेट हो जाता है और हर तरह के सवाल हम पूछने लगते हैं. ऐसे में दिमाग का सेरीब्रम (Cerebrum) हिस्सा जो कि हमें सोचने की शक्ति देता है का संतुलन बिगड़ने लगता है. वो अपनी ढंग से सोचने की क्षमता में थोड़ा कमज़ोर हो जाता है क्योंकि उस पर डर हावी हो जाता है और हम ज़्यादा सोचने लगते हैं.

वैसे, कई रिसर्चर्स का ये भी मानना है कि ज़्यादा सोचना हमारे शरीर का एक सर्वाइव करने का तरीक़ा भी है. ज़्यादा सोचने से हम आने वाली हर हालात के लिए दिमाग़ी तौर पर तैयार भी हो जाते हैं.

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ख़ैर, ज़्यादा सोचना आपके दिमाग़ के लिए सही भी नहीं है. कई बार ये दिमाग़ी बिमारी का भी कारण बन जाता है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि ध्यान रखें कि अब अचानक से बहुत ज़्यादा नेगेटिव सोचने लग रहे हैं तो उसे सकारात्मक सोच से रोकें. अपने दिल में बातें न रखें, अपने ख़्याल शेयर करें. भरपूर नींद लें. योग करें. जैसे ही आपको लगे की आप ज़्यादा सोच रहे हैं तुरंत अपना ध्यान कहीं और भटकाएं और ज़्यादा तक़लीफ़ होने पर किसी डॉक्टर के पास जाएं.