साल 2011 से पहले उन्हीं लोगों को भारतरत्न दिया जाता था जिन्होंने कला, साहित्य, विज्ञान और मानव सेवा के क्षेत्र में उतकृष्ट कार्य किया हो. लेकिन सरकार ने नियमों में संशोधन करके ये तय किया कि वो सभी इस सम्मान के अधिकारी होंगे, जो मानव उद्यम के किसी भी क्षेत्र से जुड़े होंगे.

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नियमों के बदलाव के बाद साल 2013 में क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को भारतरत्न दिया गया. सचिन तेंदुलकर यानी क्रिकेट का एक महान खिलाड़ी और जब भारत में किसी महान खिलाड़ी का ज़िक्र होता है, तब पहला नाम निर्विरोध रूप हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद का लिया जाता है.

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मेज़र ध्यानचंद से पहले किसी अन्य खिलाड़ी को भारतरत्न दिया जाना बहुतों को रास नहीं आया. ऐसा नहीं है कि लोग सचिन को कमतर आंकने की बात करते हैं, क्योंकि दोनों खेलों और खिलाड़ियों की तुलना नहीं की जा सकती. फिर भी मेज़र ध्यानचंद भारतरत्न के पहले हक़दार हैं इसमें कोई दो राय नहीं है.

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ये भी नहीं है कि ये कुछ मुट्ठी भर हॉकी प्रेमियों की मांग है. मेजर ध्यान चंद को भारतरत्न देनी की मांग बड़े स्तर पर की जाती रही है.

साल 2011 में ध्यानचंद को भारतरत्न देने की 82 सांसदों की याचना पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया.

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साल 2013 में जब सचिन को भारत रत्न दी जाने की बात हो रही थी, तब एक बड़े तबके ने ये मांग भी उठाई थी कि खेल के क्षेत्र में सबसे पहले ये सम्मान ध्यानचंद को मिलना चाहिए. चूंकि सचिन उसी साल क्रिकेट से रिटायर हुए थे, इसलिए उनके नाम का तत्काल जनसमर्थन ज़्यादा था.

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उस साल खेल मंत्रालय ने भी सचिन के साथ मेजर ध्यानचंद के नाम को भी भारतरत्न के लिए प्रस्तावित किया था.

2016 में मेज़र ध्यानचंद के बेटे और पूर्व भारतीय हॉकी टीम के कप्तान अशोक कुमार के साथ 100 अन्य हॉकी खिलाड़ियों ने बड़े ज़ोर-शोर से ये मांग उठाई थी कि मेजर ध्यानचंद को भारतरत्न मिलना चाहिए.

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आज की पीढ़ी शायद बस उनके नाम से वाकिफ़ हो, लेकिन वो क्या शख़सियत थे ये आकड़ें ख़ुद-ब-ख़ुद बोल पड़ते हैं. ध्यानचंद जी 400 से भी ज़्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी अकेले खिलाड़ी हैं, और आज तक उनका ये रिकॉर्ड कोई भारतीय खिलाड़ी नहीं तोड़ पाया है. जब ध्यानचंद जी भारतीय हॉकी टीम में थे, तब इंडिया ने ओलंपिक में तीन गोल्ड मेडल (1928, 1932 और 1936) जीते थे और इन तीनों मैच में भारत को एक तरफ़ा जीत मिली थी. इसके अलावा मेजर ध्यानचंद जी का हिटलर द्वारा दिए गए नागरिकता के प्रस्ताव को ठुकराने वाला किस्सा तो याद ही होगा.

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यूं ही उन्हें 'हॉकी का जादूगर' नहीं कहा जाता था. यहां तक बातें होती थीं कि वो रेल की पटरी पर भागते हुए गेंद पर नियंत्रण रखने की प्रैक्टिस करते थे.

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उनके जन्मदिन को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है. इस दिन सरकार द्वारा खेल से जुड़े पुरस्कार बांटे जाते हैं. 1956 में उन्हें तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण भी दिया गया. दिल्ली के नेशनल स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रखा गया.

ये सभी चीज़ें साफ़-साफ़ बताती हैं कि मेज़र ध्यानचंद खेल जगत के कितने बड़े नाम थे. इसलिए जब भारतरत्न की बात आती है, तो मेजर ध्यानचंद को अभी तक ये सम्मान नहीं मिलना... एक खेल प्रेमी के तौर पर हमें ये बात ख़लती है.