एक दौर था जब लोगों के मनोरंजन का एक मात्र साधन रेडियो हुआ करता था. हिंदी और अंग्रेजी में समाचार और बीच-बीच में ये आकाशवाणी है के साथ फ़िल्मी गीतों का आना लोगों को बांधे रखता था. अधिकतर फ़रमाइशी गीतों के बाद एक लाइन आती थी, 'गीत लिखा है मजरूह सुल्तानपुरी ने... याद आया कुछ. मजरूह सुल्तानपुरी, उर्दू का एक ऐसा शायर जिसने हज़ारों फ़िल्मी गीत लिखे. उनका चाहूंगा मैं तुझे शाम सवेरे... उस दौर का सबसे बड़ा हिट गाना था. अब बात हो रही है फिल्मों में उनके गानों की तो आपको बता दें कि मजरूह साहब 50 और 60 के दशक के हिंदी फ़िल्मी संगीत की रूह थे.

मजरूह साहब ने 'बाबू जी धीरे चलना' से लेकर 'आज में ऊपर...आसमां नीचे' जैसे गाने लिखे, पर वो इन गानों को केवल अपनी जीविका चलाने के लिए लिखते थे. वो खुद अपने गानों को नौटंकी बोलते थे, क्योंकि उनकी जान हमेशा उनकी ग़ज़लों और शेर-ओ-शायरी में ही बसी थी. हर मुशायरे की जान रहने वाले मजरूह जी का असल नाम असरार उल हसन खान था, पर दुनिया ने उनको मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से जाना. मजरूह का मतलब होता है घाय. शायद यही वजह है कि आज भी उनकी शायरी, ग़ज़लों, नज़्मों में बहुत दर्द सुनाई पड़ता है.

इस शायर, गीतकार, ग़ज़लकार के बारे में लिखा जाए तो, बहुत कुछ है लिखने को, पर आज हम आपके लिए उनके लिखे हुए कुछ चुनिंदा शेर और नज़्में लेकर आये हैं. इनमें आपको प्यार-इश्क़-मोहब्बत के अलावा दर्द, गुस्से के साथ-साथ और भी कई भावनाएं देखने को मिलेंगी.

तो चलिए नज़र डालते हैं उनकी कलम से निकले कुछ उर्दू के शेरों पर:

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