मजरूह सुल्तानपुरी का एक मशहूर शेर है कि, 'मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया.'

बिहार के रहने वाले इम्तियाज़ पर ये शेर बिलकुल सटीक बैठता है, जिन्होंने करीब डेढ़ साल पहले दहेज प्रथा के ख़िलाफ़ एक मुहीम शुरू की थी. ये मुहीम आज बिहार के कई इलाकों में बहुत बड़ा कैंपेन बन चुकी है.

बिना थाम-झाम की शादी बनी लोगों के लिए प्रेरणा

इस कैंपेन की शुरुआत इम्तियाज़ की शादी के साथ 18 नवंबर 2016 में हुई. उनकी इस शादी में न कोई बाराती था और न ही कोई गाना बजाना. सादगी के साथ हुई इस शादी में घर के 6 लोगों ने हिस्सा लिया, जबकि बैंड-बाजे के बजाय कुरान और हदीस के उन संदेशों को पढ़ा गया, जो लड़कियों की सामाजिक स्थिति के बारे में बात करते हैं.

उनकी शादी में फूल और गुलदस्ते के बजाय हाथों से लिखे ऐसे पोस्टर टांगे गए, जिन पर दहेज के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई थी. इम्तियाज़ ने इन बातों को सिर्फ़ पोस्टर तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि जब उनकी पत्नी ने पहली बार घर में कदम रखा, उस समय भी वो खाली हाथ थीं.

अपनी सालगिरह को उन्होंने बड़े ही अनोखे ढंग से मनाया और अपने इस जश्न को 'Unnoticed Clothes' कैंपेन का नाम दिया. इम्तियाज़ के इस जश्न में उनकी पत्नी ने भी साथ दिया. इस कैंपेन के तहत उन्होंने मुज़फ्फरपुर के चंदवारा मोहल्ले की मस्जिदों और मंदिरों में पोस्टर लगाए हैं, जिनमें लोगों से अपील की गई कि वो घर में पड़े हुए पुराने और इस्तेमाल नहीं हो रहे कपड़ों को कार्टन में ला कर रख दें, जिससे ये किसी ज़रूरतमंद तक पहुंचाये जा सकें.

इस कैंपेन के बारे में इम्तियाज़ कहते हैं कि 'अभी इस मुहीम को शुरू हुए केवल 27 दिन ही हुए हैं और हमारे पास तकरीबन ढाई हज़ार से ज़्यादा स्वेटर, जैकेट, टी शर्ट, शर्ट, पैंट और महिलाओं के कपड़े आ चुके हैं, जिन्हें हम ज़रूरतमंदों के बीच बांट कर हम उन्हें ठंड से बचाने की एक कोशिश कर रहे हैं.'

इस क्लॉथ कैंपेन के बारे में इम्तियाज़ कहते हैं कि 'इसे शुरू करने के पीछे हमारा मकसद यह था कि आज इंसान की एवरेज ऐज 55 से 60 साल के बीच है और 25 से 30 साल की उम्र में ज़्यादातर लोगों की शादी हो ही जाती है. यानी एक इंसान अपने जीवन में 25 से 30 बार अपनी शादी की सालगिरह को मनाता है. अगर 125 करोड़ आबादी के 1% लोग भी अपनी सालगिरह को सामाजिक तौर पर मनाना शुरू करें, तो हम 1,2500000 लोगों के लिए कुछ ना कुछ ज़रूर कर सकते हैं. अगर इसमें जन्मदिन जैसे दूसरे समारोह भी शामिल हों, तो फिर कहने ही क्या.'

इम्तियाज़ कहते हैं कि उनके इस कैंपेन को लेकर लोगों की सोच भी बढ़ रही है. वो अब तक 13 ऐसे लोगों की शादी में हिस्सा ले चुके हैं, जहां बिना किसी ताम-झाम और दान-दहेज के शादी हुई. एक शादी के बारे में इम्तियाज़ कहते हैं कि एक लड़का अपने निकाह से ठीक पहले खड़ा हो गया और लड़की के भाई और पिता को स्टेज पर बुलाया. इसके बाद उनसे कहा कि 'यहां जितने भी मेहमान बैठे हैं मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि मैं कोई बारात नहीं लाना चाहता था, पर इनकी ज़बरदस्ती की वजह से मुझे बारात लानी पड़ी है. मैं ये शादी तभी करूंगा, जब ये शादी दहेज के बिना होगी.'

इम्तियाज़ की ये मेहनत अब रंग भी दिखाने लगी है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी बिहार में 2 अक्टूबर को दहेज ख़िलाफ़ एक कैम्पेन की शुरुआत की है.

आज जब शादियों की चकाचौंध में आंखें रंगीन रौशनी के सामने चौंधियाने लगती है. ऐसे में इम्तियाज़ उम्मीद की एक ऐसी किरण बन कर उभरे हैं, जिसकी रौशनी ख़ुशियां फैलाने का एक प्रयास कर रही है.

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