"आदमी वो नहीं, हालात बदल दे जिनको, आदमी वो है, जो हालात बदल देते हैं!" इस बात को चरितार्थ किया है पंजाब के 69 वर्षीय पूर्ण चंद परदेसी ने. महज 12 साल की उम्र में ही अपने दोनों हाथ गंवा चुके पंजाब का यह बेटा, होशियारपुर जिले के बजवाड़ा गांव के रहने वाले हैं. उनके भले ही हाथ न हों, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमज़ोरी नहीं माना, बल्कि जीवन के इस कठोर सत्य को चुनौती मान कर संघर्ष करते रहे. परिजनों और लोगों के लाख समझाने के बावजूद परदेसी ने आर्टीफिशियल हाथ नहीं लगाए. बल्कि हाथों में चमड़े की छोटी सी बैल्ट लगा कर उसके बीच कलम फंसा कर लिखना शुरू कर दिया. और लिखते-लिखते, लाखों किताबें लिख डालीं. हम आपको इसी शख़्स से मिलवाने जा रहे हैं जिनके बारे में जान कर आप भी गौरान्वित महसूस करेंगे.

1. 1970 में द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक पास किया और होशियारपुर के साधु आश्रम में बतौर प्रूफ़ रीडर करियर की शुरूआत की

2. 1976 में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने पूर्ण चंद को नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया

3. पूर्ण चंद परदेसी की पंजाबी के अलावा हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी पर अच्छी पकड़ है.

4. 2005 में रिटायरमैंट के बाद भी संस्थान अभी भी उनकी सेवाएं ले रहा है.

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कुछ लोग ऐसे होते हैं जो प्रकृति के प्रहार को अपनी ज़िंदगी नहीं मान लेते हैं. वो इसे एक चुनौती की तरह लेते हैं, उनसे लड़ते हैं और आगे बढ़ कर देश और दुनिया में अपनी एक पहचान बनाते हैं. आप इस आर्टिकल को पढ़ें और अपने दोस्तों के साथ शेयर भी करें.