28 दिसंबर 2013 को पहली बार आम आदमी को साथ लेकर चलने का वादा करते हुए हुए आम लोगों की पार्टी ने दिल्ली में सरकार बनाई. नाम था आम आदमी पार्टी और इसका नेतृत्व कर रहे थे अरविन्द केजरीवाल. साथ में कमान संभाली मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, शाज़िया इल्मी, प्रशांत भूषण, शान्ति भूषण, पत्रकारिता छोड़ कर आये आशुतोष ने. ये पार्टी एक मिडिल क्लास आदमी की पार्टी थी, जिसमें कोई सैनिक था, कोई पत्रकार था, कोई नौकरशाह था और कोई प्रोफ़ेसर.

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जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन के बाद ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई राजनीतिक पार्टी आम आदमी के हक़ की बात कर रही थी. भ्रष्टाचार में लिप्त कांग्रेस और Polarized बीजेपी के बाद पहली बार लोगों के पास कोई तीसरा विकल्प था, जिस पर एक आम आदमी भरोसा कर रहा था. ये एक तरह से बाज़ी ही थी, पर लोग छद्दम नेताओं और पार्टियों के झूठे वादों से इतना तंग आ चुके थे कि उनके लिए ये बाज़ी फ़ायदे का सौदा थी.

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ईमानदारी से काम करने, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने, और सबको सभी बुनियादी सुविधायें दिलवाने के वादे से इस सरकार का सफ़र शुरू हुआ. धीरे-धीरे शुरुआत में जुड़े कुछ लोग अलग हो गए, आरोप पार्टी के नेताओं पर भी लगे, कभी भ्रष्टाचार के, कभी सेक्स सीडी सामने आने के. कभी पार्टी में मची अंतर्कलह ने सुर्खियां बनाई, कभी CM केजरीवाल पर किसी के जूते-इंक फेंकने की ख़बर ने.

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लगभग 3 साल बाद पार्टी की इमेज बदल गयी है. मुख्यमंत्री केजरीवाल पर हर दूसरे दिन बखेड़ा खड़े करने के आरोप लगते हैं. प्रधानमंत्री मोदी और पूर्व LG, जंग के साथ उनकी बहस कई बार बड़ा रुख ले चुकी है. मीडिया में ये ख़बरें इतनी दिखाई जाती हैं कि किसी के लिए भी 'आप' एक बवाल मचाने वाली पार्टी बन कर रह गयी है.

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जहां एक तरफ़ AAP का एक चेहरा दिल्ली के CM केजरीवाल हैं, वहीं इसका दूसरा चेहरा हैं मनीष सिसोदिया. उन्हें ज़्यादा बयानबाज़ी करते हुए कभी नहीं देखा गया. इस वक़्त मनीष सिसोदिया दिल्ली के उप मुख्यमंत्री हैं और साथ में एजुकेशन मिनिस्ट्री भी देख रहे हैं. पिछले 3 सालों में मनीष सिसोदिया ने क्या काम किया है, इसकी ख़बर ज़्यादातर मीडिया हाउज़ कवर नही करते, क्योंकि ज़ाहिर सी बात है, उसमें मसाला नहीं होता. लेकिन 20 महीनों में मनीष सिसोदिया वो काम कर चुके हैं, जो अभी तक कई पार्टियां मिल कर नहीं कर पाईं.

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री, एजुकेशन मिनिस्टर, मनीष सिसोदिया के 3 साल का रिपोर्ट कार्ड ये है

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  • देश के प्राइवेट स्कूल्स की तुलना में सरकारी स्कूल कहीं नहीं टिकते, कुछ समय पहले तक यही हाल दिल्ली के स्कूलों का भी था. लेकिन अगर आपका बच्चा दिल्ली के सरकारी स्कूल में पढ़ता है, तो आपको इसकी भलीभांति जानकारी होगी कि कुछ सालों में एजुकेशन में कितने बदलाव आये हैं. बैठने के लिए टेबल-कुर्सी है, प्रॉपर यूनिफॉर्म है, स्कूल का इंफ्रास्ट्रक्चर बिलकुल बदल गया है, स्कूल अब पहले के मुकाबले बहुत साफ़ हैं.

  • सबसे बड़ी बात, हर शुक्रवार को एक घंटे के लिए बच्चों के माता-पिता टीचरों से मिलते हैं. जिन मां-बाप ने कभी स्कूल और टीचर की शक्ल नहीं देखी थी, अब वो हर शुक्रवार अपने बच्चों की परेशानियां डिस्कस करने आते हैं. पेरेंट-टीचर मीटिंग का कॉन्सेप्ट ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में नहीं होता. मनीष सिसोदिया के प्रयासों ने ये भी मुमकिन कर दिखाया.

ये वीडियो आपको बहुत हद तक दिल्ली के सरकारी स्कूल्स में बदलाव की बयार दिखा देगा:

ये बदलाव सिर्फ़ स्कूल तक ही सीमित ही नहीं रहे, बल्कि पिछले 20 महीनों में मनीष सिसोदिया ने कुछ ऐसे फ़ैसले लिए, जो बाकि सरकारों के समय में मीटिंग और फाइलों से बाहर ही नहीं निकले:

  • दिल्ली वो पहला राज्य बना, जहां इलेक्शन में टीचर की ड्यूटी बंद की गयी, ताकि वो अपना ध्यान बच्चों के भविष्य पर केन्द्रित कर सकें.
  • दिल्ली वो पहला राज्य है, जहां किसी भी छात्र को 10 लाख तक का एजुकेशन लोन दिया जा सकता है, बिना फ़ालतू के पेपरवर्क के. इस लोन के अन्दर फीस, स्कूल का खर्चा, लैपटॉप, हॉस्टल चार्ज सब आएगा.
  • पहली बार दिल्ली में टॉप 90 प्रिंसिपलों को टीचिंग पर सेशन लेने के लिए ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज भेजा गया.
  • दिल्ली वो पहला राज्य बना, जहां प्राइवेट स्कूल से फीस का रिफंड और प्रॉस्पेक्टस पर लिया जा रहा पैसा कम करवाया गया. इसके लिए मनीष सिसोदिया को कोर्ट में लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी. लेकिन आखिरकार ये पॉसिबल हुआ. DPS जैसे बड़े स्कूल प्रॉस्पेक्टस के नाम पर हज़ारों का जो चूना लगाते थे, वो अब महज 100 रुपये कर दिया गया.
  • दिल्ली वो राज्य बना, जहां टीचर अगर लीव पर गया है, तो प्रिंसिपल को इसकी पावर दी गयी है कि वो पार्ट टाइम टीचर का इंतज़ाम करे. पहले इसके लिए सरकारी फ़ाइल भेजनी पड़ती थी.
  • टीचर्स की सैलरी से लेकर उनके काम और आसान बनाने से जुड़े सभी काम इस सरकार ने कर के दिए हैं. यहां तक कि टीचर्स को टीचिंग और बेहतरी से समझाने के लिए 250 बेस्ट टीचरों की टीम तैयार की गयी है, जो उन्हें और बेहतर बनाएगी.
  • हर स्कूल और क्लास में कमज़ोर छात्रों पर ध्यान देने के लिए शीट बनाई गयी हैं ताकि इसका स्टेटस मनीष तक पहुंचता रहे.
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इतना सब होने के बाद भी, ऐसा हो सकता है कि इन बदलावों का असर अभी न दिखे. बाकी इंडस्ट्री के मुकाबले एजुकेशन ऐसा सेक्टर है, जहां परिणाम को मापने के लिए 5-8 सालों का इंतज़ार करना पड़ सकता है, क्योंकि इन बदलावों के नतीजे इतनी जल्दी नहीं दिखने वाले. लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं, कि मनीष सिसोदिया और उनकी टीम ने हर वो प्रयास किया है, जिससे हम इस देश को एक बेहतर भविष्य दे सकते हैं.

ये सभी जानकारी Quora पर शुरू हुए एक डिस्कशन से ली गयीं हैं.

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