प्रतिभा न तो उम्र की मोहताज होती है और न ही सुख-सुविधाओं की. इन्सान में अगर जज़्बा है, तो वो मुसीबतों से लड़कर भी अपने लक्ष्य को पा लेता है. ये बात साबित कर दी है मैक्सिको की 22 साल की Maria Lorena Ramirez ने. 50 किलोमीटर की लम्बी दौड़, जिसमें 12 देशों से 500 प्रतिभागी शामिल हों, उस दौड़ में पहला स्थान पाना आसान नहीं होता.

अब आप सोच रहे होंगे कि दौड़ थी, तो किसी न किसी को तो पहले स्थान पर आना ही था, इसमें ख़ास क्या है? मगर ख़ास है जनाब.

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दरअसल बात है सेंट्रल मैक्सिको के Puebla में आयोजित Ultra Trail Cerro Rojo नाम की महिलाओं के एक Ultra-marathon की. 50 किलोमीटर लम्बी दौड़ कोई लड़की पैरों में रबर की सैंडल ( Used Tyre से बनी हुई) पहनकर दौड़े और बिना किसी ट्रेनिंग के ही, 500 प्रोफ़ेशनल एथलीट लड़कियों को हरा दे, तब है न ख़ास बात.

22 साल की Maria ने ये दौड़ 7 घंटे और 3 मिनट में ख़त्म की. उनके पास प्रोफ़ेशनल Racers की तरह दौड़ में पहनने वाले जूते और कपड़े नहीं थे. इसलिए उन्हें टायर के रबर से बनी सैंडल पहनकर दौड़ना पड़ा. आराम दायक कपड़ों की जगह उन्हें घुटने से नीचे तक की स्कर्ट और स्कार्फ़ पहनकर दौड़ना पड़ा. उन्हें इस दौड़ में जीतने पर 6000 Pesos यानि लगभग 21000 रुपये ईनाम में मिले.

बकरी चराने वाली Maria ने नहीं ली कोई प्रोफेशनल ट्रेनिंग

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ख़ास बात यह है कि Maria ने दौड़ की कोई ट्रेनिंग पहले कभी नहीं ली है, मगर जब वो दौड़ती हैं, तो लगता है कि उन्हें सिर्फ़ दौड़ने के लिए ही बनाया गया है. जैसे ये उनके Genes में हो. दौड़ने के अलावा Maria का मुख्य काम पशुओं को चराना है, जिसके लिए उन्हें रोज़ 10-15 किलोमीटर चलना पड़ता है. ये पहली बार नहीं है जब Maria ने कोई दौड़ जीती है, बल्कि इसके पहले Chihuahua में आयोजित Cabella Blanco नाम की 100 किलोमीटर की दौड़ में उन्हें दूसरा स्थान मिला था.

ताराहुमारा जनजाति के नाम पहले भी दौड़ के कई रिकॉर्ड रहे हैं

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Maria, मूल अमेरिका की ताराहुमारा जनजाति से हैं. उनकी अपनी भाषा में ताराहुमारा का मतलब ही 'Runners on Foot' होता है. इस जनजाति के लोगों ने दौड़ने के मामले में पहले भी बहुत से रिकॉर्ड बनाए हैं. इस जनजाति के ही एक व्यक्ति के नाम 435 मील दौड़ने का Record है. दौड़ना इनके लिए एक कला है. इनके धार्मिक आयोजनों, त्यौहारों और समारोहों में दौड़ भी शामिल रहती है.

Maria की इस जीत से हमारे देश की लड़कियां और लड़के भी प्रेरणा ले सकते हैं. हमारे देश में भी बहुत से पिछड़े इलाकों में, आदिवासी जनजातियों में और ग़रीब घरों की सीमित सुविधाओं में जीने वाली कई प्रतिभाएं हैं, जिन्हें उचित मार्गदर्शन और प्रेरणा दिए जाने की ज़रूरत है. इससे न केवल वे देश के लिए कुछ बेहतर कर सकेंगे, बल्कि समाज की मुख्यधारा से कन्धा मिलाकर चल सकेंगे.

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