नारी शक्ति के आगे कोई भी टिक नहीं पाता है, ये तो सबको पता ही होगा. अगर कोई महिला किसी मुश्किल घड़ी में हिम्मत से काम लेकर उससे बाहर आ सकती है, तो वो कोई भी काम कर सकती है, फिर चाहे हवाई जहाज़ उड़ाने की बात हो या दुनिया चलाने की वो अपने हर काम को शिद्दत से करती हैं. ऐसी ही शकुंतला काले की प्रेरणादायक कहानी.

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पहले आपको बता दें कि शकुंतला काले महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की अध्यक्ष हैं और कुछ दिनों पहले ही उन्होंने 12वीं और 10वीं बोर्ड परीक्षा के नतीजे घोषित किये हैं. उनके लिए ये काम किसी बड़े सपने जैसा ही था और उनको पता था कि जब वो ये काम करेंगी तब अंबेगांव तालुका में स्थित उनके गांव के लोगों और उनके परिवार वालों को उन पर बहुत गर्व होगा. लेकिन इस पोज़िशन तक पहुंचने के लिए उन्होंने कई मुश्किलों का सामना किया है. जी हां, शकुंतला ने गांव में अपने परिवार के साथ रहते हुए और परिवार का ध्यान रखते हुए अपने सपने को भी पूरा किया. उनकी कड़ी मेहनत ने साबित कर दिया है कि अगर कोई भी व्यक्ति विषम परिस्थितियों के आगे हिम्मत से खड़ा रहे तो वो भी झुक जाती हैं और रास्ता आसान हो जाता है.

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आइये अब जानते हैं शकुंतला काले की कहानी:

TOI के अनुसार, शकुंतला जब केवल 4 साल की थीं तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी और परिवार को पालने-पोसने केलिए उनकी मां मजदूरी करती थीं. उस वक़्त उनके गांव में कोई जूनियर स्कूल भी नहीं था. स्कूल न होने की वजह से उन्होंने पूरी पढ़ाई भी नहीं की और मात्र 14 वर्ष की आयु में उनकी शादी भी कर दी गई. उनका ससुराल काफ़ी बड़ा था यानी कि संयुक्त परिवार था. शादी के कुछ सालों बाद तक ही वो 2 बच्चों की मां भी बन चुकी थीं. ऐसे ही धीरे-धीरे उनकी ज़िन्दगी गुज़र रही थी.

शादी और बच्चों के बाद की पूरी की पढ़ाई

उनके ससुराल के सदस्यों और पति की मदद और रज़ामंदी से शकुंतला ने अपनी पढ़ाई शुरू की. उन्होंने डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से अपना ग्रेजुएशन किया और फिर पुणे यूनिवर्सिटी (सावित्रीबाई फूले यूनिवर्सिटी) से मराठी भाषा में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की. अपनी पढ़ाई के बारे में बात करते हुए शकुंतला ने बताया, 'जब आपको पता है कि परिस्थितियां सुधरेंगी नहीं, तो आपको अपने अंदर से शक्ति मिलती है. मैं हमेशा से महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमिशन (MPSC) का एग्ज़ाम देने का सपना देखा करती थी.' पर मेरे पास प्रतियोगी किताबें नहीं थी, और मेरे गांव में एक ही टीवी था. मैं रोज़ रेडियो सुनती थी और अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाती थी.'

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इसके साथ ही उन्होंने बताया कि, 'स्कूल से लौटने के बाद मैं घर के काम करते-करते पूरे टाइम रेडियो सुनती रहती थी. गांव में पानी की समस्या थी और पानी लेने के लिए सुबह 3 जाना पड़ता था. जिस कारण मैं रात में भी ज़्यादा देर सो नहीं पाती थीं क्योंकि मुझको घर के सारे काम भी निपटाने होते थे और अपनी पढ़ाई भी करनी होती थी. वो बताती हैं कि मुझे रेडियो पर समाचार सुनना इतना पसंद था कि जैसे ही रेडियो पर न्यूज़ शुरू होती थी मेरे बच्चे भाग कर मुझे बताने आते थे.'

कड़ी मेहनत से शकुंतला को मिली सफ़लता

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शकुंतला ने 1993 में MPSC Class 2 की परीक्षा अच्छे नंबर्स से पास की, जिसके बाद सोलापुर में शिक्षा विभाग में उनकी नियुक्ति हुई. इसके बाद भी उन्होंने पढ़ाई नहीं छोड़ी और 1995 में MPSC Class 1 का एग्ज़ाम क्लियर किया. उनकी मेहनत और लगन से पढ़ाई पूरी करने को देखते हुए उनको महिला शिक्षा और विस्तार विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया. वो बताती हैं, उन्होंने पीएचडी पूरी की और जिस साल ये पूरी हुई वो अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष था. उसके बाद कई अलग-अलग डिपार्टमेंट्स में काम करने के बाद 25 सितम्बर, 2017 में उनको राज्य बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया.

शकुंतला काले का महिलाओं के लिए सन्देश

शकुंतला कहती हैं कि, 'कई बार मुझे हैरानी भी होती है कि मैं इतना आगे कैसे बढ़ गई. इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं और लड़कियों को सन्देश दिया कि जीवन में कभी संघर्ष करना न छोड़ें क्योंकि अगर आपके पास दृढ़ निश्चय और मेहनत करने की हिम्मत है तो मौके ख़ुद-ब-ख़ुद आपको तलाश ही लेते हैं.'

देश की हर महिला को शकुंतला जी से प्रेरणा लेनी चाहिए, ख़ासकर कि उन महिलाओं को जो गांव में रहती हैं. ग़ज़बपोस्ट की ओर से शकुंतला काले को बहुत बधाई!