दुनिया में आज भी कुछ जनजातियां आधुनिकीकरण से दूर रहती हैं. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पास, उत्तरी सेंटिनेल द्वीप में ऐसी ही जनजाति रहती है.

सेंटिनली आदिवासियों का पूरी दुनिया से कोई संबंध नहीं है. कई जनजाति और अादिवासी आधुनिकीकरण के संपर्क में आकर परिवर्तित हो गए हैं लेकिन सेंटिनली आज भी अपने जड़ों से ही जुड़े हैं.

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सेंटिनली आदिवासियों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश में हाल ही में एक अमेरिकी ईसाई मिशनरी की जान चली गई. हालांकि इस जाति से संपर्क साधने की ये पहली कोशिश नहीं थी. इससे पहले कई बार भारत सरकार ने सेंटिनली आदिवासियों से संपर्क करने की कोशिश की है, लेकिन इसमें ज़्यादा सफ़लता नहीं मिली है.

कौन हैं सेंटिनली?

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बाकी दुनिया से अलग-थलग रहने वाले कुछ जनजातियों में से एक हैं सेंटिनली. Survival International के अनुसार, इस जनजाति के पूर्वज अफ़्रीका से थे और अंडमान के उत्तरी सेंटिनेल द्वीप पर 60,000 सालों से रह रहे हैं. इनकी भाषा भी अंडमान के बाकी जनजातियों की भाषा से बेहद अलग है.

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बाकी दुनिया को दुश्मन नहीं समझते सेंटिनली आदिवासी

ये हवाबाज़ी टाइप बात नहीं है. BBC की रिपोर्ट कहती है कि सेंटिनली आदिवासियों से मिलने वाले सबसे पहले शख़्स हैं, त्रिलोक नाथ पंडित. भारत के जनजातीय कार्य मंत्रालय के क्षेत्रिय हेड, त्रिलोक नाथ 1967 में 20 लोगों की टीम के साथ सेंटिनली आदिवासियों से मिलने गए और सही-सलामत वापस भी लौट आए. त्रिलोकनाथ ये भी कहते हैं कि ये आदिवासी शांतिप्रिय हैं और बस अकेले रहना चाहते हैं.

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त्रिलोकनाथ ने कहा,

जब हमारी उनसे बात हुई तब भी वे हमें धमका रहे थे लेकिन बातचीत इस मोड़ तक नहीं पहुंची की वे हमें ज़ख़्मी करें या हमारी जान पर बन आए. जब भी वे नाराज़ होते हम अपने कदम ज़रा पीछे हटा लेते.'

त्रिलोकनाथ ने आगे कहा,

मुझे उस युवा की मृत्यु पर दुख है. ग़लती उसी ने की थी. ख़ुद को बचाने के लिए उसके पास काफ़ी समय और चांस थे. अपनी बात पर अड़े रहने के कारण उसे अपनी जान गंवानी पड़ी.
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सेंटिनली आदिवासी से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में बताते हुए त्रिलोकनाथ ने कहा,

हम उनके लिए तोहफ़े लेकर गए थे. बरतन, नारियल, लोहे के औजार जैसे हथौड़े, चाकू आदि. हम अपने साथ Onge जनजाति के भी 3 लोगों को ले गए थे ताकी हम उनसे बातचीत कर पाए. सेंटिनली आदिवासियों ने हमारा स्वागत तीर-धनुष से किया, उनके हाव-भाव से ही पता चल रहा था कि वे अपनी ज़मीन किसी भी क़ीमत पर बचाएंगे.

BBC से ही बातचीत में त्रिलोकनाथ ने कहा कि दोस्ती का हाथ बढ़ाने की एक कोशिश बुरी तरह नाक़ामयाब हुई थी. एक बार त्रिलोकनाथ की टीम ने पेड़ से एक सुअर को बांधा था और सिंटेनली आदिवासियों ने उसे मार कर समुद्री तट पर दफ़ना दिया था.

1991 में मिली संपर्क बनाने में सफ़लता

कई कोशिशों के बाद 1991 में सिंटेनली आदिवासियों से संपर्क बनाने में सफ़लता मिली. ये आदिवासी समंदर में ख़ुद आए और नारियल लिया.

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त्रिलोकनाथ ने कहा,

हम हैरान थे. हमसे मुलाक़ात करने का पूरा निर्णय उनका था और मुलाक़ात भी उन्हीं की शर्तों पर हुई. हम नाव से कूद कर समंदर में उतरे और उन्हें नारियल और दूसरे तोहफ़े दिए. मगर हमें उनकी ज़मीन पर पैर रखने की इजाज़त नहीं थी. तोहफ़े पाकर वे लोग आपस में ही बात कर रहे थे और हम उनकी भाषा नहीं समझ पा रहे थे लेकिन वो सुनने में आस-पास रहने वाले अन्य प्रजातियों से मिलती-जुलती थी.

एक बार मिली थी धमकी

त्रिलोकनाथ ने बताया कि एक बार उन्हें एक छोटे से सेंटिनेली ने धमकी थी.

मैं नारियल बांट रहा था और बाकियों से ज़रा अलग हो गया और तट की तरफ़ जाने लगा. एक छोटे सेंटिनेली लड़के ने चाकू से इशारा किया कि वो मेरी गर्दन काट देगा. बस मैंने नाव बुलाई और वापस लौट गया. उस लड़के का इशारा काफ़ी था, हम उनकी धरती पर नहीं जा सकते.
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1991 के बाद से भारत सरकार ने सेंटिनेली आदिवासियों को तोहफ़े देना बंद कर दिया और बाहर के लोगों की वहां जाने पर पाबंदी लगा दी.

धमकी मिलने के बावजूद त्रिलोकनाथ यही कहते हैं कि सेंटिनेली ख़तरनाक नहीं हैं, वो बस ये चाहते हैं कि कोई उनकी ज़मीन पर कदम न रखें.