26 जनवरी सन 1950 को हमारे देश को पूर्ण स्वायत्त गणराज्य घोषित किया गया था और इसी दिन हमारा संविधान लागू हुआ था। हर साल इस दिन के आने से पहले ही स्कूलों में कई तरह के प्रोग्राम बच्चों को तैयार कराए जाते हैं. देश की राजधानी दिल्ली में इस दिन के लिए बहुत भव्य तैयारियां की जाती हैं. इस दौरान परेड के साथ-साथ कई तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किये जाते हैं.

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हर साल ये सब तैयारियां और कार्यक्रम मुझे अपने स्कूल वापस ले जाते हैं, जब हम सब बच्चे मिलकर इस दिन को ख़ुशी-ख़ुशी मनाते थे. गणतंत्र दिवस के दिन के लिए आयोजित होने वाले समारोह में हिस्सा लेने वालों की लिस्ट में अपना नाम देखने की वो ख़ुशी कभी नहीं भुलाई जा सकती. वो ख़ुशी कार्यक्रम में हिस्सा लेने से ज़्यादा इस बात की होती थी, कि प्रेक्टिस करने की वजह से क्लास में नहीं जाना पड़ेगा. क्लास के बाकी बच्चों की तरह होमवर्क नहीं मिलेगा. पता था मुझे कि ये ख़ुशी सिर्फ़ चार-पांच दिन की ही है, मगर ऐसा लगता था जैसे पूरे जहां की ख़ुशियां मिल गईं मुझे.

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26 जनवरी आने की ख़ुशी आज भी होती है बस मायने बदल चुके हैं. अब जॉब करने लग गई हूं और अब वो मस्तियां नहीं रह गईं, लेकिन जब छोटी थी तब बहुत मज़ा आता था. मैम जब पूछती थीं, कि कौन-कौन पार्टिसिपेट करेगा, तो मैं सबसे पहले हाथ उठा देती थी और जल्दी से डांस कॉम्प्टीशन में अपना नाम लिखा लेती थी.

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वहां से शुरू होता था मेरी ख़ुशियों का और मेरे दोस्तों के जलने का दौर, क्योंकि प्रोग्राम में हिस्सा लेते ही, मैं मैम की सबसे फ़ेवरेट स्टूडेंट हो जाती थी. मेरे लिए नियम-क़ानून सब बिल्कुल बदल जाते थे. कुछ दिनों तक ऐसा लगता था, जैसे मैं कोई प्रिसेंस हूं.

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ऐसा सिर्फ़ स्कूल में ही नहीं घर पर भी होता था. कई बार मैं पापा को मम्मी से कहते सुनती थी, उससे कुछ मत कहना आजकल डबल मेहनत कर रही है. बस उसे पढ़ाई और डांस प्रैक्टिस पर ध्यान देने दो, देखना जीतकर आएगी. पापा का वो विश्वास एक अलग ताक़त देता था.

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पापा का मेरे ऊपर इतना विश्वास दिखाना मेरे भाई-बहन को हज़म नहीं होता था. जहां मैं टीचर और पापा की फ़ेवरेट हो जाती थी, वहीं मैं अपने दोस्तों और भाई-बहनों की दुश्मन. मगर उस दुश्मनी में एक अलग मज़ा होता था, दोस्तों की वो जलन बहुत सुकून देती थी.

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आज जॉब करते ये सब बहुत याद आता है. 26 जनवरी के वो लड्डू बहुत याद आते हैं, सुबह-सुबह उठकर स्कूल जाना बहुत याद आता है. डांस कॉम्प्टीशन की ड्रेस और बाकी चीज़ें इकट्ठा करने के लिए दोस्तों के घर जाना बहुत याद आता है.

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पता है अब नहीं मिलेंगे वो दिन, फिर भी मन कहीं न कहीं झूठी आस लगाता है काश! वापस आ जाएं वो दिन.