कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होती हैं. अकसर फ़िल्मों के ज़रिए समाज में होने वाली हर अच्छी-बुरी गतिविधी को कहानी के माध्यम से हम तक पहुंचाया जाता है. ऐसी ही कुछ हिंदी फ़िल्में हैं, जो न सिर्फ़ अपने किरदारों की वजह से, बल्कि अपनी कहानी की वजह समाज में एक अमिट छाप छोड़ती हैं. इनमें से कुछ फ़िल्में ऐसी भी थीं, जिनका विषय बहुत ही गंभीर था.

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आइए जानते हैं कौन-कौन सी हैं वो फ़िल्में.

1. मंथन (1976)

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1976 में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फ़िल्म मंथन, डॉ. वर्गीस कुरियन के White Revolution पर आधारित थी. इसमें दिखाया गया था कि किस तरह से एक डॉक्टर ग्रामीणों की भलाई के लिए एक सहकारी समिति डेयरी शुरू करने के लिए एक गांव का दौरा करते हैं. ये एक सुपरहिट फ़िल्म थी. इस फ़िल्म में स्मिता पाटिल, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी, मोहन अगासे, अनंत नाग, कुलभूषण खरबंदा और गिरीश कर्नाड मुख्य भूमिका में थीं.

2. मंडी (1983)

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1983 में आई ये फ़िल्म राजनीति और वेश्यावृत्ति पर एक कटाक्ष थी. इसमें शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल मुख्य भूमिका में थे. ये फ़िल्म लेखक गुलाम अब्बास की क्लासिक उर्दू की कहानी आंनदी पर आधारित थी. इस फ़िल्म के लिए नितीश रॉय ने नेशनल अवॉर्ड जीता था. इसका निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया था.

3. मासूम (1983)

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1983 में निर्माता शेखर कपूर ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरूआत इस फ़िल्म की थी. ये समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फ़िल्म थी. इस फ़िल्म में तनुजा, सुप्रिया पाठक और सईद जाफ़री के साथ प्रमुख भूमिकाओं में नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी थीं. इसमें जुगल हंसराज और उर्मिला मातोंडकर ने बाल कलाकार के रूप में काम किया था. इस फ़िल्म की कहानी उस दौर से बहुत आगे थी.

4. ख़ामोश (1985)

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विधु विनोद चोपड़ा द्वारा निर्देशित ख़ामोश एक मर्डर मिस्ट्री थी. इसमें नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी और अमोल पालेकर मुख्य भूमिका में थे.

5. फ़ायर (1996)

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दीपा मेहता निर्देशित फ़ायर, दो ऐसी महिलाओं की कहानी थी, जो अपने वैवाहिक जीवन में ख़ुश नहीं थीं. ये एक सामाजिक कुप्रथा पर आधारित थी. इसमें शबाना आज़मी और नंदिता दास मुख्य भूमिका में थीं.

6. आस्था (1997)

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फ़िल्म आस्था उस महिला की कहानी है, जो अपने पति को ढूंढते-ढूंढते और अपने बच्चों की ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए सेक्स रैकेट में फंस जाती है. इस फ़िल्म में बहुत ही विवादास्पद मुद्दे को उठाया गया था. इस रोल के लिए अभिनेत्री रेखा की बहुत आलोचना की गई थी.

7. सलाम बॉम्बे! (1998)

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इस फ़िल्म की निर्देशक मीरा नायर थीं. फ़िल्म में बॉम्बे के स्ट्रीट किड्स की ज़िंदगी को दर्शाया गया है. इस फ़िल्म ने द न्यू यॉर्क टाइम्स के 'द बेस्ट 1,000 मूवीज़ एवर मेड' में अपनी जगह बनाई थी. इसमें नाना पाटेकर मुख्य भूमिका में थे.

8. दिल से (1998)

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ये फ़िल्म रोमांटिक-थ्रिलर थी, जो आतंकवाद और उत्तर-पूर्वी राज्यों के तनावों पर आधारित है. इसका निर्देशन मणिरत्नम ने किया था. इसके निर्माता रामगोपाल वर्मा और शेखर कपूर थे. फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान और मनीषा कोईराला मुख्य भूमिका में थे.

9. क्या कहना! (2000)

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ये एक फ़ैमिली ड्रामा थी. ये फ़िल्म एक ऐसी लड़की की कहानी थी, जो शादी से पहले प्रेग्नेंट हो जाती है. उसके बाद वो समाज से और अपनों से लड़कर अपने बच्चे को दुनिया में लाती है. इस फ़िल्म में प्रीती ज़िंटा, सैफ़ अली ख़ान, चंद्रचूर्ण सिंह, अनुपम खेर और फ़रीदा जलाल मुख्य भूमिका में थीं. इसका निर्देशन कुंदन शाह ने किया था.

10. चांदनी बार (2001)

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मधुर भंडारकर द्वारा निर्देशित ये फ़िल्म मुंबई के अंडरवर्ल्ड, वेश्यावृत्ति और डांस बार में काम करने वाली लड़कियों की कहानी पर आधारित थी. फ़िल्म में तब्बू और अतुल कुलकर्णी मुख्य भूमिकाओं में हैं.

11. मानसून वेडिंग (2001)

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मीरा नायर द्वारा निर्देशित मानसून वेंडिग में पंजाबियों की ग्रांड वेडिंग की मस्ती को दिखाने के अलावा धोखा, विश्वासघात और बाल यौन शोषण जैसे सामाजिक मुद्दों पर आधारित थी. इसमें राम कपूर, रणदीप हुड्डा, प्रवीण दबास, वसुंधरा दास, शेफ़ाली छाया, कुलभूषण खरबंदा, नसीरुद्दीन शाह, रजत कपूर, लिलेट दुबे और वियज राज मुख्य भूमिका में थे.

12. लज्जा (2001)

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ये फ़िल्म सामाजिक कुरीतियों पर आधारित थी. इसका निर्देशन राजकुमार संतोषी द्वारा किया गया था. ये फ़िल्म भारत में महिलाओं की दुर्दशा पर आधारित थी. इस फ़िल्म में मनीषा कोईराला, माधुरी दीक्षित, रेखा, महिमा चौधरी, अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ़ और अजय देवगन मुख्य भूमिका थे.

13. फ़िलहाल (2002)

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2002 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म में सबसे पहले सरोगेसी को ऑनस्क्रीन दिखाया गया था. इसे मेघना गुलज़ार ने निर्देशित किया था. इसमें मुख्य भूमिका में तब्बू, सुष्मिता सेन, संजय सूरी और पलाश सेन थे.

14. मातृभूमि (2003)

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निर्देशक मनीष झा द्वारा निर्देशित ये फ़िल्म कन्या भ्रूण हत्या और महिलाओं की घटती संख्या के मुद्दे पर आधारित थी. इसमें एक ऐसे भारतीय गांव की कहानी को दर्शाया गया है जिसमें केवल पुरुष ही हैं क्योंकि वर्षों से चली आ रही कन्या भ्रूण हत्या के चलते अब गांव में एक भी लड़की या महिला ज़िंदा नहीं है. इस फ़िल्म को बेहद सराहा गया था और 2003 में कई फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया था, जिनमें 2003 वेनिस फ़िल्म समारोह भी शामिल है.

15. चमेली (2004)

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करीना कपूर और राहुल बोस अभिनीत फ़िल्म चमेली, एक बैंकर और एक वेश्या के बीच की कहानी है, जो सिर्फ़ एक रात में पूरी कहानी को दर्शाती है. फ़िल्म का निर्देशन सुधीर मिश्रा ने किया था.

16. माई ब्रदर निखिल (2005)

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2005 में आई इस फ़िल्म को ओनिर ने निर्देशित किया था. फ़िल्म एक युवा तैराक निखिल के जीवन की कहानी थी, जो एचआईवी पॉज़ीटिव है. इसमें जूही चवला और संजय सूरी मुख्य भूमिका में थे.

17. तारे ज़मीन पर (2007)

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ये फ़िल्म एक 8 साल के बच्चे ईशान की कहानी थी, जो डिस्लेक्सिक है. इसमें आमिर ख़ान ने एक शिक्षक, जिसका नाम राम शंकर निकुंभ का किरदार निभाया था और उस 8 साल के बच्चे का किरदार दर्शील सफ़ारी ने निभाया था. इसमें अभिनय करने के साथ-साथ आमिर ने इसका निर्देशन भी किया था.

ऐसी कहानियों की गवाह हैं ये फ़िल्में जिन पर लोग खुलकर बात भी करना नहीं चाहते और इन्हें पर्दे पर जिया गया था.