राजनीति में कुछ शब्दों को फिर से पारिभाषित करने की ज़रूरत है. राष्ट्रवाद भी उनमें से एक है. राष्ट्रवाद का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में जैसा कुरूप हुआ है, वैसा कभी भारत में नहीं था. राष्ट्रवाद अब बुद्धिजीवियों को उग्रवाद से अलग नहीं लगता. हिंसा को राष्ट्रवाद ने कुछ ऐसे ओढ़ लिया है कि इसका चमकने वाला हिस्सा पीछे चला गया है. अब राष्ट्रवाद का मतलब गौरक्षक, संघ और हिन्दू अतिवाद हो गया है, जिसे कहीं से भी स्वीकारा नहीं जा सकता. राष्ट्रवाद के नाम पर समाज को वही काली चादर दिखाई जा रही है, जिसमें कालिख लगी है.

भारत का राष्ट्रवाद यूरोपियन राष्ट्रवाद नहीं है

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भारत सीमाओं में सिमटा हुआ राष्ट्र नहीं है. इसका विस्तार ही इसकी विशेषता है. भारत को अगर संकीर्ण राष्ट्रवाद में जकड़ दिया जायेगा, तो भारत की मौलिकता खतरे में पड़ जायेगी. भारत का राष्ट्रवाद यूरोप के राष्ट्रवाद से बिलकुल उलट है. वहां पूंजीवाद और अधिनायकवाद को राष्ट्रवाद से जोड़ कर देखा जाता है.

भारत की संस्कृति में ही राष्ट्रवाद है. आज से नहीं सदियों से. भारत ने ब्रिटेन से राष्ट्रवाद नहीं सीखा है. भारत की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है राष्ट्रवाद. यजुर्वेद में पहली बार राष्ट्र की संकल्पना बुनी गई थी. यजुर्वेद का श्लोक 'माता भूमि:, पुत्रो अहं पृथिव्या:' का अर्थ है धरती मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं. यह राष्ट्रवाद के लिए भारतीयों की पहली उक्ति थी. राष्ट्र माता है तो ज़ाहिर सी बात है मां के प्रति बच्चे का स्वाभाविक प्रेम होगा जिसे किसी वाद का नाम देना ग़लत होगा.

कैसा था भारत में राष्ट्रवाद का स्वरूप?

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भारत में सभ्यता के विकास के सापेक्ष ही राष्ट्रवाद का विकास होता रहा. जो जिस राज्य में रह रहा था उस पर, किसी भी तरह का आसन्न संकट आने पर बिना सोचे समझे, बलिदान हो जाने को अपना धर्म समझता था. भारत कोई एक निश्चित राष्ट्र नहीं कई छोटे-बड़े भूखंडों का हिस्सा था. मन्त्रों में तो भारतीय ज़रूर कहते थे, 'आर्यावर्ते भरतखंडे जम्बू द्वीपे' लेकिन इस राष्ट्र की कोई तय सीमा नहीं थी. इसका विस्तार निर्धारित नहीं था. लोगों की निष्ठा मात्र उस क्षेत्र के शासक तक थी, जहां वे रहते थे. कई बार छोटे-छोटे राज्यों में लड़ाईयां भी होती रहती थीं. भीषण युद्ध भी होते थे. तब उनका राष्ट्रवाद केवल अपने राज्य तक सीमित था. समूचे जम्बू द्वीप को अपना राष्ट्र वे तब नहीं मानते थे. राष्ट्रीयता की भावना आज की तरह तब उनमें नहीं थी.

भारत में 19वीं सदी से पहले राष्ट्रवाद जनसामान्य का विषय नहीं था. जो जहां रहता था, उसी जगह को अपनी मातृभूमि मानता था. राज्य स्थायी रहता था लेकिन राजा बदल जाते थे. जनता को दो वक़्त की रोटी से मतलब होता था, इससे ज़्यादा उन्हें शासन-प्रशासन की गतिविधियों से कोई सरोकार नहीं था. जब युद्ध की संभावनाएं बनती थीं, तब लोगों को मजबूरन युद्ध में शामिल होना पड़ता था. मरने वालों में सैनिक होते थे जो उसी क्षेत्र विशेष के नागरिक होते थे. आक्रमणकारी जीत जाता तो बचे हुए सैनिक उसके वफ़ादार हो जाते थे. राष्ट्रवाद राजा के राजा रहने तक ही जीवित रहता था.

मुस्लिम आक्रमण और राष्ट्रवाद

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जो लूटकर चले जाते थे, उन्हें जनता भूल जाती थी, जो रुक जाते थे वे भारतीय हो जाते थे.

मुस्लिम आक्रमणकारियों के भारत में आगमन के वक़्त भी केवल उन्हीं राज्यों में राष्ट्रीयता और युद्ध की भावना भड़की, जहां युद्ध की संभावना या परिस्थितियां बनी. जहां आक्रमणकारियों का राज्य हुआ, जनता उनके प्रति समर्पित हो गई. उनकी देशभक्ति भी उसी शासक के प्रति समर्पित थी.

कुछ सौ साल बाद मुग़ल आये. आये तो आक्रमणकारी बन कर थे लेकिन अपनी नीतियों की वजह से वे भी भारतीय समाज का हिस्सा बन गए.

मुगलों के सापेक्ष भी हिन्दू राजाओं के राज्य चले जिनके प्रति भी जनता समर्पित रही. ये समर्पण सत्ता का डर था. लोकतंत्र नहीं था जो पांच साल बाद वोट डाल कर सरकार बदल देते. अपनों में से ही चुने हुए सैनिकों का अत्याचार सहते-सहते जनता की प्रवृत्ति में सहना शामिल हो गया था. इस काल में भी राष्ट्रवाद दरबारों में गिरवी पड़ा था.

हालात कुछ ऐसे हो गए थे कि जनता को कहना पड़ता था, 'कोउ नृप होय हमें का हानि?' यानि राजा कोई भी हो हमें उससे क्या मतलब.

ब्रिटिश राज और राष्ट्रवाद का नव जागरण

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जब भारत में ब्रिटिश काल का उदय हुआ और अंग्रेज़ धीरे-धीरे शक्तिशाली होने लगे, तब भारतीयों को वे विजातीय लगे और विद्रोह शुरू हुआ. विद्रोह की शुरुआत में ये केवल राज्यों तक सीमित रहा लेकिन शोषण बढ़ा तो भारतीयों में राष्ट्र भावना भी पनपी.

1857 की क्रांति के बाद भारत के लोगों में आधुनिक राष्ट्रवाद की भावना का उदय हुआ. यह यूरोप के राष्ट्रवाद से बिलकुल अलग था. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में साम्यवाद और राष्ट्रवाद भी साथ-साथ चले हैं, अलग बात है दोनों का परिप्रेक्ष्य अपने मूल सिद्धांतों से बिलकुल उलट था. भारत में किसी ने न साम्यवाद के सभी सिद्धांतों को अक्षरशः माना है, न ही यूरोपियन राष्ट्रवाद के सिद्धांतों को.

भारत का राष्ट्रवाद राजनीति का नया प्रयोग था. भारत के लोग विकास भी चाहते थे, शोषण और दमन से मुक्ति भी चाहते थे और लोकतंत्र भी चाहते थे. यहां जो ख़ुद साम्यवादी दर्शन में यकीन रखते थे वे भी लोकतान्त्रिक बना रहना चाहते थे. साम्यवाद के अधिनायक होने में उनका जितना यकीन था उतना ही राष्ट्रवाद के उग्र हो जाने का डर उन्हें सताता था. इसलिए भारत में इन विदेशी वादों को दरकिनार कर नया वाद बना भारतियता का.

इसके समर्थक चाहते थे मजदूर भी हों, किसान भी हों और उद्दोगपति भी हों. सबको आगे बढ़ने का मौका एक साथ मिले. भारतीय संविधान समाजवाद, साम्यवाद और राष्ट्रवाद तीनों को साथ लेकर चला है.

आज़ादी की लड़ाई के केंद्र बिंदु में थी भारत की अखंडता. राज्यों ने अपनी-अपनी संप्रभुता छोड़ कर पहली बार एक राष्ट्र का सपना देखा था. कुछ राज्यों के प्रतिनिधियों ने राजतन्त्र को कायम रखने की मांग राखी लेकिन उनकी मांग को दबा दिया गया. आज़ादी की लड़ाई का आधार अब भारत को लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनाना था.

धर्म आधारित राष्ट्रवाद और विभाजन का दर्द

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भारत आज़ाद हुआ. भारत के समानांतर एक और राष्ट्र बना पाकिस्तान. भारत में राष्ट्रवाद दो ढर्रे में बंट गया. मुस्लिम लीग के राष्ट्रवाद का परिणाम 15 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के रूप में जन्मा. दमित-शोषित और वंचित रह जाने की भावना ने धर्म का चोगा ओढ़ लिया था. जिनकी आंखों में अखंड भारत का सपना पल रहा था, वे अब हिन्दू-मुसलमान हो रहे थे. बंटवारा हुआ, ख़ून की नदियां बहीं. अंग्रेज़ों की 'फूट डालो राज करो' का सिद्धांत सामने आया. तब से लेकर अब तक सम्प्रदायिकता बढ़ती ही रही. राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही उसका अंत हो गया.

राष्ट्रवाद की जो भावना आज़ादी की लड़ाई के वक़्त भड़की थी अगर वो अंतिम तक साथ रहती और संकीर्ण धार्मिकता का भय मुस्लिम लीग को न हुआ हुआ होता, तो शायद आज अखंड भारत की तस्वीर कुछ और होती. धर्म के हाथों देश बंट चुका था. इस वक़्त भारत को राष्ट्रवाद की ज़रुरत थी. सावरकर या जिन्ना के राष्ट्रवाद की नहीं, भारत के स्वाभाविक राष्ट्रवाद की. सर्वे भवन्तु सुखिनः से विश्व बंधुत्व तक का पाठ पढ़ाने वाले भारतीय दर्शन की. अफ़सोस भारतीय भटक गए और अब तक राष्ट्रवाद को नहीं समझ पाए.

राष्ट्रवाद का विभत्स स्वरूप

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बुद्धिजीवियों ने विश्वयुद्ध की तबाही, नस्लवाद, धर्मान्धता और पूंजीवाद से राष्ट्रवाद को जोड़ दिया.

इतिहासकारों की मानें तो प्रथम विश्वयुद्ध के मूल में थी सामरिक गुट बाज़ी, उपनिवेशवाद, अंधाधुंध हथियारों का निर्माण और उग्र राष्ट्रवाद की लहर. इसी के समान्तर चले साम्यवाद को मिटाने के लिए फासीवाद और नाज़ीवाद का उदय हुआ. जिसे बाद में राष्ट्रवाद कहा गया. महान बनने की लड़ाई में एक बड़ी आबादी ख़त्म हो गई. फासीवाद जिसे हिटलर की आत्मा राष्ट्रवाद कह रही थी उसने युद्ध के उन्माद में एक ऐसा यज्ञ किया, जिसमें लाखों लोगों को गैस चैंबर में डाल कर स्वाहा कर दिया गया.

ये हिटलर का राष्ट्रवाद था. इसका परिणाम ये हुआ कि जर्मनी तबाह हो गया. एक उन्नत राष्ट्र जिसे हिटलर ने और मजबूत बनाया वही इस राष्ट्रवाद की आंधी में ऐसे तबाह हुआ कि वर्षों तक खड़ा न हो सका. एक राष्ट्रवादी ने अपने देश को जिस तरह से तबाह किया उसकी क्रूरता से आज भी दुनिया भय खाती है. डर है राष्ट्रवाद की यही उग्र आंधी भारत में न चल जाए.

राष्ट्रवादी पत्रकारिता का उन्माद

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पाकिस्तान की ओर से गोली चलती है हिन्दुस्तानी जवान शहीद हो जाता है. प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और न्यूज़ वेबसाइट्स पर तहलका मच जाता है. सारे चैनलों में होड़ मच जाती है कौन ज़्यादा राष्ट्रवादी है. टीवी चैनलों का बस चले तो पाकिस्तान पर परमाणु बम गिरा कर ही मानें. लेकिन अभी ऐंकर्स की बात को मनवाने का कोई अध्यादेश सरकार ने पास नहीं किया है. जिस हिसाब से टीवी चैनलों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हो रही है, उस हिसाब से लग रहा है कि जल्द ही संसद के कैबिनेट में, कुछ मीडिया घरानों को शामिल कर लिया जायेगा.

पत्रकार अब पत्रकार कम और सरकार के प्रवक्ता ज़्यादा हो गए हैं. एक वक़्त था जब सरकार की आलोचना और उसके नीतियों की समीक्षा करना पत्रकार का धर्म होता था लेकिन अब वक़्त बदल गया है. जिन पत्रकारों ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाये हैं, उन पर देशद्रोही होने का तमगा लगा दिया है. पत्रकार या कोई भी व्यक्ति जब सरकार की आलोचना पर उतर आता है तो सोशल मीडिया के धुरंधर उसे देशद्रोही बता देते हैं.

सरकार और राष्ट्र दो अलग-अलग संस्थाएं हैं लेकिन ऐसा भ्रम फैलाया गया है कि अब दोनों को एक ही समझा जा रहा है. चाहे जनता बुनियादी सुविधाओं को तरसे, मंहगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती चली जाये और देश में सांप्रदायिकता का नंगा नाच मचे लेकिन सरकार को कुछ मत कहो. आलोचना करते ही तुम्हें देशद्रोही कह दिया जाएगा. जिस जनता के अधिकारों की बात करोगे, वही जनता तुम पर जूते-चप्पल उछालेगी.

राष्ट्रवादी सरकार के राज्य में राष्ट्र का बिखराव

Source: IndianExpress

कश्मीर में हिंसा नहीं थम रही है. अलग राष्ट्र 'द्रविनाडु' की मांग उठ रही है. पूर्वोत्तर के राज्य भी हिंसा की लपेट में जल रहे हैं. नक्सलवाद ने भी तूल पकड़ा है. महीने-दो महीने में जवानों की एक पलटन शहीद हो जाती है. जवान भी निर्दोष होते हैं और अदिवासी जनता भी. बड़े प्लेयर्स पांच सितारा होटलों में पार्टी करते हैं, लेकिन पकड़े नहीं जाते. विपक्ष बहस के केंद्र में 'कौन, क्या खायेगा' रहता है, लेकिन ज़रूरी मुद्दे नहीं. देश में इतनी अशांति है पर शोर मच रहा है अच्छे दिन आने वाले हैं. बंटवारा अच्छा दिन लाएगा क्या?

हिंदू, मुसलमान, हरिजन, सवर्ण, राष्ट्रवादी, वामपंथी जैसे शब्दों ने अलगाववाद को बढ़ावा ही दिया है. यह सामाजिक अलगाववाद है. इसकी जड़ें बहुत गहरी हो रही हैं.

विपक्ष का सारा ध्यान मोदी,भाजपा और संघ के इर्द-गिर्द घूमता रहता है. मुद्दे उनके भी मेनिफे़स्टो से ग़ायब हैं. विपक्ष की पूरी राजनीति में मोदी और संघ से इतर कुछ भी नहीं होता.

राजनीति में जब चिंतन का केंद्र बिंदु एक व्यक्ति, संस्था और विचारधारा को बना दिया जाता है तब ज़रूरी मुद्दे, ग़ैर ज़रूरी लगने लगते हैं जिन पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता. फिर गाय-गोबर, धर्म-जाति, देशप्रेमी-देशद्रोही, हिंदी बनाम अंग्रेज़ी जैसे मुद्दे पैदा हो जाते हैं. बिखराव फिर कैसे रुके? डर है ये बिखराव स्थायी न हो जाये.

राष्ट्रवाद का विरोध क्यों?

Source: TheQuint

कोई भी विचारधारा जब स्वाभाविक नहीं रह जाती तब विरोध होना शुरू हो जाता है. सौ तरह के आरोप उस विचारधारा पर लगते हैं. जो ख़ामियां नहीं भी होती हैं वे भी नज़र आने लगती हैं. अगर वो विचारधारा बहुसंख्यकों की है, तो आलोचना का दायरा भी बढ़ जाता है. सावधानी बरतने की सबसे ज़्यादा ज़रुरत तब उसे ही होती है.

भाजपा के राष्ट्रवाद के केंद्र में गौरक्षकों, राष्ट्ररक्षकों और धर्मरक्षकों का जो चेहरा सामने आ रहा है वो ज़रूरी नहीं सच हो, लेकिन उत्पात मचाने का सारा इल्ज़ाम भाजपा और संघ पर लगता है. बेहतर होता सत्ता में आने के बाद संघ और भाजपा में विनम्रता बची रहती. राष्ट्रवाद की परिभाषा मनचाहे ढंग से गढ़ी नही जाती, तो संभव था देशद्रोहियों की अचानक से बाढ़ नहीं आती.

राष्ट्रवाद कैसा हो ?

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एक राष्ट्रवादी जापानी भी हैं जिन्होंने अपने देश को विकास का पर्यायवाची बना दिया है, एक हम हैं गाय, गोबर, राष्ट्रवाद, अच्छे दिन, घर वापसी, और भक्ति के दायरे से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

कितना अच्छा होता कि हमारे राष्ट्रवाद की पृष्ठ भूमि में होता, भय, भूख और भ्रष्टाचार से आज़ादी. हमारे राष्ट्रवाद का विस्तार होता कश्मीर में शांति बहाली. हर तबके तक न्याय की पहुंच इतनी सुलभ होती कि किसी को नक्सली न बनना पड़ता. अच्छा होता कि अपने-अपनों को न मारते. किसान आत्महत्या न करते और उन्हें उन्नत बाज़ार मिलता. मजदूरों का शोषण न होता, वे भी समाज की मुख्यधारा में शामिल होते. लोगों को रोटी, कपड़ा और मकान के लिए तरसना न पड़ता. गांधी के रामराज्य का सपना सच होता. राज्य के नीति निदेशक तत्वों का अक्षरशः पालन होता. हमारा राष्ट्रवाद ऐसा क्यों नहीं है?

हम जहां रहते हैं वहां की संस्कृति, रहन-सहन, बोलचाल का अच्छा लगना स्वाभाविक है. सब चाहते हैं देश आगे बढ़े, विकसित हो. सबको शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार मिले. किसी को अपने देश से नफ़रत नहीं होती. कोई अगर सरकार के विरोध में है तो इसका मतलब ये नहीं है कि वो देश का विरोध कर रहा है. सरकार देश नहीं है. देशभक्ति का ठेकेदार भी नहीं है. न ही संविधान में कोई ऐसा अनुच्छेद है जो कहता है हर आदमी को देशभक्त होना चाहिए. वैसा देशभक्त जो आजकल हर गली, नुक्कड़ और चौराहे पर पान थूकता मिल जाता है.

भारतीय समाज में आधुनिक राष्ट्रवाद

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राष्ट्रवाद का झंडा तभी बुलंद होगा जब राष्ट्र बचेगा, अगर उन्माद की भेंट चढ़ा तो बिखराव के अलावा कुछ नहीं बचेगा. देश पे कोई संकट नहीं आया है कि घर-घर राष्ट्रवाद की अलख जगानी पड़े, जब ज़रूरत आएगी तो सब देश के लिए कुछ भी करने को तैयार होंगे. अभी राष्ट्रवाद से भी ज़रूरी कई मुद्दे हैं जिनपर मीडिया और सरकार को ध्यान देने की ज़रूरत है, राष्ट्रवाद का क्या है कभी भी प्रचार किया जा सकता है.

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