हिन्दुस्तानी संस्कृति में प्रकृति को मां से जोड़ा गया है. हम इसलिए ऐसा कहते हैं क्योंकि हमारे जीवन पर इसका असर बहुत ही ज़्यादा है. वायु से हमें ऊर्जा मिलती है, वन से भोजन और जल से संरक्षण. इनके अलावा कई और ऐसी चीज़ें हैं, जिनका असर हमारे जीवन पर बहुत गहरा है. ऐसा नहीं कि यह लगाव सिर्फ़ हमारे ग्रंथों में ही है. हमारे अलावा कई और धर्मों में प्रकृति के संरक्षण की बातें कही गई हैं. सभी धर्म ग्रंथों में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि बिना प्रकृति के जीवन असंभव है. यदि मानव सभ्यता को बचाना है, तो प्रकृति के बीच में रह कर प्रकृति का संरक्षण करना होगा.

Source: DW Hindi

क्या कहता है हिन्दू धर्म?

हिंदू दर्शन के अनुसार, जन्म और मृत्यु के चक्र में सभी गुंथे हुए हैं. चाहे आत्मा हो, शरीर, दृश्य या अदृश्य सबका इस चक्र में महत्व है. इस वजह से ये सभी अस्तित्व में हैं. जीवन का प्राकृतिक चक्र बना रहना चाहिए, जो भी कुछ ले रहा है, उसे लौटाना जरूरी है.

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भगवद् गीता में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है, 'ईश्वर त्याग (यज्ञ) से प्रसन्न हो कर लोगों की इच्छाएं पूरी करते हैं. जो लोग इनका उपयोग तो करते हैं, लेकिन लौटाते कुछ नहीं, वह चोर हैं.'

बौद्ध धर्म और प्रकृति

बौद्ध धर्म में प्रकृति के आधार पर ही जीवन की कल्पना की गई है. इसका मत है कि प्रकृति और इंसान एक-दूसरे पर निर्भर हैं. जिसे भी ज्ञानबोध या मुक्ति चाहिए उसे महसूस करना होगा कि उसमें और दूसरे प्राणियों में कोई फ़र्क नहीं है.

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पाली त्रिपिटक में कहा गया है कि प्रकृति में पाई जाने वाली सभी चीजें एक-दूसरे से जुड़ी हैं. अगर यह है तो वह भी होगा. इसके साथ वह भी आएगा. अगर ये नहीं होगा तो वह भी नहीं. इसके ख़त्म होने के साथ उसका भी अंत होगा.

ईसाई और यहूदी धर्म की कहानियां भी प्रकृति से जुड़ी हैं

आपने आदम और हव्वा की कहानी तो सुनी ही होगी. भगवान ने अपनी रचना को बचाने का काम इंसान को दिया है. ईश्वर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा, 'सफ़ल रहो और अपनी संख्या बढ़ाओ. धरती को भर दो, उसे अपने कब्जे़ में ले लो. सागर की मछली, हवा में उड़ती चिड़िया और वहां पाए जाने वाले हर प्राणी को अपने अधीन कर लो.' इसका अर्थ यह हुआ कि प्रकृति की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी हम मनुष्यों की है.

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इस्लाम में भी कहा गया है

क़ुरान का सूरा-ए-रहमान कहता है कि किस तरह ख़ुदा ने सूरज, चांद और आसमान की गति निर्धारित की है. उसी ने पेड़ पौधे बनाए हैं. उसने ही संतुलन तय किया. इंसान की उत्पति प्रकृति को बचाने के लिए की गई है.

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कुल मिला कर बात यह है कि हम इंसानों के नेतृत्व में ही प्रकृति की रक्षा की ज़िम्मेदारी है. बिना हमारे सहयोग के ये दुनिया अधूरी है. आइए, हम संकल्पित होकर यह प्रण लें कि पृथ्वी की रक्षा हम ही करेंगे.

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