आपने कभी मंटो की कहानियां पढ़ी हैं? अगर नहीं पढ़ी तो नंदिता दास की 'मंटो' आपके लिए नहीं है. वहीं अगर फ़िल्म देखने का मन है, तो पहले मंटो को एक बार एक सनक के साथ पढ़ लेना. नहीं तो मंटो समझ नहीं आएगा. वो इसलिए क्योंकि मंटो कोई कहानी की किताब नहीं, जो आपको मज़ा देगी.

वेश्याओं से मंटों का रिश्ता

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मंटो अपनी हर कहानी में एक सवाल छोड़ते थे. वो सवाल जो समाज़ से जुड़ा हुआ है. वो सवाल ऐसा है जिसका जवाब आपको पता है लेकिन आप चाहकर भी उसका जवाब नहीं दे पाते. क्योंकि मंटो ख़ासकर वेश्याओं की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते थे. वो पार्टीशन के दौरान हुए समाजी दंगों के बारे में लिखते थे. उन अफ़सानों को लिखते थे, जो समाज का एक आईना होती थी.

फ़िल्म में एक सीन है जब मंटो बने नवाज़ से पूछा जाता है कि आपको महिलाओं के लिए इतनी हमदर्दी क्यों हैं? तो मंटो जवाब देते हैं,'हर औरत के लिए नहीं सिर्फ़ उन औरतों के लिए जो ख़ुद को बेच तो नहीं रही लेकिन लोग उसको ख़रीदते जा रहे हैं और कुछ उनके लिए जो रात को जागती हैं और दिन में सोते हुए ख़्वाब देखकर उठ जाती हैं कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है.'

जवाब में वो ये भी कहते हैं, 'वेश्याओं के यहां जाने की इजाज़त है, लेकिन उनके बारे में लिखने की नहीं, क्यों?'

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फ़िल्म से पहले मंटो को पढ़ने की सलाह इसलिए दी है क्योंकि फ़िल्म में कब मंटो की कहानियां आपके सामने आएंगी, आपको पता ही नहीं लगेगा. आपको उन कहानियों की धार ही नहीं पता चल पाएगी. वैसे जब आप मंटो को जान जाएंगे, तो आपको मंटो अच्छी नहीं लगेगी. वो इसलिए क्योंकि फ़िल्म में आधी कहानियां वो चलेंगी जिन्हें आप पढ़ चुके हैं और आधे में मंटो की ज़िन्दगी. इतना कुछ होने के बाद भी लगेगा कि 'मंटो' अधूरी है.

मंटो और उसकी दोस्ती

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फ़िल्म में मंटों के तीन दोस्त दिखाए गए हैं- श्याम चड्डा, अशोक कुमार और इस्मत चुगतई. श्याम चड्डा से उनकी गहरी बनती थी. श्याम चड्डा उस वक़्त के उभरते हुए फ़िल्म अभिनेता थे. 1944 से 1951 के बीच उन्होंने कई फ़िल्में कीं. एक फ़िल्म की शुटिंग के दौरान घुड़सवारी के दौरान हुई एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई. मंटो और श्याम चड्ढा ने एक शब्द का ईजाद किया था 'हिपतुल्लाह', इसकी कहानी आपको फ़िल्म में भी देखने को मिलेगी.

उस वक्त के बड़े स्टार अशोक कुमार के साथ भी मंटों की बड़ी घनिष्टता थी, ऐसा मंटो ख़ुद कहते थे. दोनों के बीच ख़ूब बातें होती थी. मंटो और अशोक कुमार इस बात पर लड़ पड़ते थे कि उन दोनों में से कौन उम्र में ज़्यादा बड़ा है, लेकिन ये सभी बातें मंटो के हवाले से कही गईं हैं. मंटों की मौत के सालों बाद BBC को दिए एक साक्षात्कार में जब दादा मुनी से मंटो के बारे में पूछा गया था तब तो उन्होंने सीधे-सीधे मंटों को नहीं जानने की बात कही, फिर कुछ देर बाद कहते 'वो बहुत शराब पीता था और अश्लील कहानियां लिखता था.'

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इस्मत आपा से दोस्ती का ये आलम था कि लोग दोनों से पूछते थे कि आप दोनों शादी क्यों नहीं कर लेते. दोनों एक मिज़ाज के लेखक थे, विवादित थे. इस पर मंटो साहब का कहना था कि अगर हम दोनों की शादी हो जाती तब हम ख़ाक हो जाते... निकाहनामे पर दोनों अफ़साने लिखते और काज़ी साहब के पेशानी पर दस्तख़त कर देते ताकि सनद रहे.

जब फ़िल्म ख़त्म होती है, तब एक दर्शक के तौर पर आपको अफ़सोस होता है. आप और देखना चाहते हैं, और जानना चाहते हैं. हमारा मानना है कि कहानी को एक ज़रूरी मोड़ पर छोड़ा गया, क्योंकि इसके आगे से दर्शक की जवाबदेही शुरू होती है.

फ़िल्म का कलातमक पहलू

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फ़िल्म में एक चीज़ जो साफ़-साफ़ दिखती है वो है निर्देशक नंदिता दास की मेहनत. एक पीरियड फ़िल्म बिना गहन रिसर्च के नहीं बनाई जा सकती है. नंदिता दास और उनकी टीम ने इस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है. यहां तक कि फ़िल्म में गाने भी वो रखे गए हैं, जो उस दौर में लिखे गए थे. हर कहानी के लिए उचित कास्ट ली गयी, जो उस किरदार की पृष्ठभूमि के साथ न्याय करने में सक्षम है.

अदाकारी के लहज़े से देखें तो नवाज़ और मंटो के बीच मात्र एक बाल बराबर का फ़र्क है, जो कई दफ़ा मिट भी जाता है. उनकी पत्नी साफ़िया के किरदार में रसिका दुग्गल कहीं भी कम या ज़्यादा नहीं लगतीं. बिल्कुल नपा-तुला अभिनय. संवाद बिल्कुल कसे हुए हैं. बाकी पहलुओं को छोड़ भी दें, तो सिर्फ़ इसके संवाद के लिए इस फ़िल्म को देखी जा सकती है.