Brands Before Independence: कोई भी बिज़नेस पल भर में बड़ा नहीं बन जाता, उसको सींचने में कई साल लग जाते हैं. इस दौरान बस एक चीज़ ज़रूरी होती है और वो है सब्र. अगर सब्र का बांध बीच में ही टूट जाए, तो आपकी सालों की मेहनत पर पानी फ़िर जाता है. वहीं, अगर कड़ी मेहनत और निष्ठा से एक बिज़नेस को चलाया जाए, तो उसे एक साम्राज्य में तब्दील करने से आपको ख़ुदा भी नहीं रोक सकता. हमारे देश के कुछ ऐसे ही बिज़नेस ब्रांड्स हैं, जिनकी नीव आज़ादी से पहले रखी गई थी. लेकिन आज़ादी के बाद उन्होंने अपना ऐसा साम्राज्य खड़ा किया कि उसका रुतबा आज भी लोगों के बीच कायम है.

चलिए जानते हैं इस लिस्ट कौन-कौन से भारतीय ब्रांड्स शामिल हैं- 

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Source: entrepreneur

Brands Before Independence

1. बिसलेरी

ये बात कम ही लोग जानते होंगे कि इटैलियन बिज़नेसमैन Felice Bisleri द्वारा शुरू की गई कंपनी बिसलेरी शुरुआत में मलेरिया की दवा बेचने वाली कंपनी थी. 1921 में जब फेलिस का निधन हुआ तो कंपनी को उनके फ़ैमिली डॉक्टर रोजिज ने ख़रीद लिया. फ़िर उन्होंने अपने वकील के दोस्त के बेटे खुशरू संतुक के साथ इस कंपनी को एक नए आइडिया के साथ शुरू करने का फ़ैसला किया. ये आइडिया पानी के बिज़नेस का था. 1965 में इसका पहला प्लांट मुंबई के ठाणे इलाक़े में स्थापित किया गया. उस वक्त पानी के अलावा सोडा को एक पैक्ड बोतल में मार्केट में उतारने वाली कंपनी बिसलेरी ही थी. 

शुरू में इसकी पहुंच सिर्फ़ अमीरों तक ही थी, जो बाद में धीरे-धीरे आम जनता तक बढ़ती चली गई. इसके बाद पार्ले कंपनी के कर्ताधर्ता 'चौहान ब्रदर्स' ने इसकी कमान अपने हाथों में ले ली. उन्होंने इसकी पैकेजिंग में कुछ बदलाव किए और बस फ़िर इसकी पॉपुलैरिटी की गाड़ी चल पड़ी. आज अपने 135 प्लांट्स के दम पर बिसलेरी रोज़ाना 2 करोड़ लीटर से भी अधिक पानी बेचने वाली कंपनी बन गई है. (Brands Before Independence)

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2. डाबर

डाबर की नींव कोलकाता के एक आयुर्वेदिक डॉक्टर एस. के. बर्मन ने रखी थी. उनके पास आयुर्वेद का काफ़ी ज्ञान था. उन्होंने हैजा और मलेरिया को मात देने के लिए कई दवाइयां भी बनाई थीं. इसके बाद साल 1884 में डॉ. बर्मन ने आयुर्वेदिक हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स बनाने के बारे में सोचा और इसकी शुरुआत की. डाबर का नाम डॉक्टर के 'डा' और बर्मन के 'बर' से लिया गया है. धीरे-धीरे उनके प्रोडक्ट्स इतने पसंद किए जाने लगे कि उन्हें इसकी एक फैक्ट्री खोलनी पड़ी. डाबर सफ़लता की सीढ़ियां चढ़ ही रहा था कि तभी डॉक्टर बर्मन का निधन हो गया. उनकी कंपनी का सारा ज़िम्मा डॉ. बर्मन की अगली पीढ़ी पर आ गया और उन्होंने अपनी इस ज़िम्मेदारी को बखूबी समझा भी. आज के समय में ऐसा इक्का-दुक्का शख़्स ही होगा, जो डाबर का नाम न जानता हो.

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3. फ़ेविकोल

किसे पता था कि गुजरात के भावनगर ज़िले के महुवा नामक कस्बे में रहने वाला एक आम व्यक्ति 'फ़ेविकोल' जैसी कंपनी का ईज़ाद कर देगा? उस व्यक्ति का नाम बलवंत पारेख था, जिनकी बिज़नेस में दूर-दूर तक कोई दिलचस्पी नहीं थी. यहां तक वो वकालत की पढ़ाई के लिए मुंबई तक शिफ्ट हो गए थे. यहां उनका मन बदला और वो डाइंग और प्रिंटिंग प्रेस में नौकरी करने लगे. इसके बाद उन्होंने लकड़ी के व्यापारी के यहां नौकरी शुरू कर दी. वो अपनी हर नौकरी में कुछ न कुछ सीखते रहे. भारत के आज़ाद होने के बाद उन्हें फ़ेविकोल जैसी कंपनी बनाने का विचार आया. (Brands Before Independence)

इस दौरान उन्हें याद आया कि कैसे कारीगरों को दो लकड़ियों को जोड़ने में खून-पसीना एक करना पड़ता था. उसे जोड़ने के लिए जानवरों की चर्बी से बने गोंद का इस्तेमाल किया जाता था, जिसकी बदबू ऐसी थी कि सूंघते ही आदमी स्वर्ग सिधारने लगे. इन्हीं सारी समस्याओं का हल ख़ोजने के लिए उन्होंने जानकारी जुटानी शुरू की. उन्हें तरीका मिल गया और साल 1959 में उन्होंने अपने भाई सुनील पारिख के साथ मिलकर पिडिलाइट ब्रांड की स्थापना की. ये कंपनी अब 200 से ज्यादा प्रोडक्ट्स तैयार करती है.

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4. महिंद्रा एंड महिंद्रा

दो भाइयों जगदीश चन्द्र महिंद्रा और कैलाश चंद्र महिंद्रा ने अपने साथी मलिक ग़ुलाम मुहम्मद के साथ मिलकर 'महिंद्रा एंड महिंद्रा' कंपनी शुरू की थी, जिसका शुरुआती नाम 'महिंद्रा एंड मोहम्मद' था. इन सभी ने इस कंपनी को स्टील कंपनी बनाने के बारे में सोचा था. लेकिन देश की आज़ादी उनके सपने की इस राह में रोड़ा बनकर सामने आई. भारत-पाकिस्तान का बंटवारा होने के साथ मलिक गुलाम मुहम्‍मद पाकिस्तान चले गए. वे वहां के पहले वित्त मंत्री और फिर पाकिस्तान के तीसरे गवर्नर जनरल बने. इसके बावजूद महिंद्रा ब्रदर्स ने हार नहीं मानी और गुलाम मुहम्मद के बिना कंपनी को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया. आज इस कंपनी के चेयरमैन आनंद महिंद्रा हैं. उनका कारोबार आज के समय में 100 देशों में फ़ैला हुआ है. (Brands Before Independence)

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5. ओबेरॉय होटल्स

इस कंपनी के फ़ाउंडर मोहन सिंह ओबेरॉय का बचपन काफ़ी मुश्किलों से भरा था. उनके पिता की तभी मृत्यु हो गई थी, जब वो मात्र 6 महीने के थे. उनकी मां ने बड़ी ही मुश्किल से उन्हें पाल-पोसकर बड़ा किया. वो नौकरी के लिए दर-दर भटके, लेकिन कहीं कोई फ़ायदा नहीं हुआ. इसके बाद अपनी क़िस्मत आज़माने वो शिमला पहुंचे. यहां क़िस्मत ने उनका साथ दिया और उनकी नौकरी 40 रुपये प्रति महीने की पगार पर उस वक्त के सबसे बड़े होटल सिसिल में बतौर क्लर्क लग गई. यहां कमाकर वो सेविंग करने लगे. इसके बाद उस होटल को 14 अगस्त 1935 को मोहन सिंह ने 25,000 रुपये में ख़रीद लिया. इसके बाद तो उनका भाग्य ऐसी स्पीड से भागा कि उनकी गति को मैच करना मुश्किल हो गया. उन्होंने अपनी मौत से पहले अरबों का होटल साम्राज्य खड़ा कर दिया. 

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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.