पूरी ज़िंदगी के संघर्ष को सराहने के लिए क्या एक अवॉर्ड काफ़ी है? ज़ाहिर सी बात है है जवाब न ही होगा. लेकिन हां, अवॉर्ड से इतना सुकून तो मिलता है कि जो कुछ किया जा रहा है, उसे समझने वाले लोग आज भी मौजूद हैं. 

आज हम आपको लखनऊ के एक ऐसे रंगकर्मी की कहानी बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी कला को समर्पित कर दी. अपने लिए कुछ भी नहीं रखा. न शादी की और न ही पैसा जमा किया. बस एक गुमटी (दुकान) के सहारे 34 सालों तक कला की सेवा करते रहे. ‘गुरू जी’ के नाम से मशहूर इस वरिष्ठ रंगकर्मी का नाम है अनिल मिश्रा, जिन्हें उत्तर प्रदेश संगीत अकादमी ने ‘अकादमी अवॉर्ड’ के लिए चुना है.

3 दशक पहले शुरू हुआ था सफ़र

अनिल मिश्रा ने 'विद्यांत हिंदू डिग्री कॉलेज' से ग्रेजुएशन करने के बाद 1996 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अभिनय में डिप्लोमा किया. हालांकि, रंगमंच का उनका सफ़र 1986 से ही शुरू हो गया था. अपने 34 सालों के लंबे करियर में उन्होंने 14 नाटकों की पटकथा लिखी, 24 का निर्देशन किया और 10 नाटकों में अपने अभिनय के ज़रिए विभिन्न पात्रों को चित्रित किया. उनकी एक किताब ‘चौराहे पर नुक्कड़’ भी प्रकाशित हो चुकी है.

अपने छात्रों और शिष्यों द्वारा 'गुरुजी' की उपाधि से सम्मानित अनिल मिश्रा ने अपने वर्कशॉप में पारंपरिक गुरुकुल प्रणाली के इस्तेमाल से सभी को प्रेरित किया है. वो कहते हैं, ‘थोड़ा ही सही, आंशिक ही सही, हमने रंगमंच में गुरुकुल की परंपरा स्थापित की.’

कला को पैसा कमाने का ज़रिया नहीं बनाया

अनिल मिश्रा का मानना है कि, ग्लोबलाइज़ेशन के बाद कला एक बाज़ार की कमोडिटी बन गई है. लोग पैसा कमाने के लिए आर्ट के साथ समझौता करने से भी नहीं चूकते. हालांकि, इसके बावजूद गुरू जी जैसे लोगों ने आज भी ओरिजनल आर्ट फॉम को बचाकर रखा है. उन्होंने कभी इसे पैसा कमाने का ज़रिया नहीं समझा. उन्होंने हमेशा नुक्कड़ नाटकों के ज़रिए समाज में हाशिये पर रह रहे लोगों की आवाज़ उठाने का काम किया है.

‘गुरुजी’ रंगमंच और नाटकों की दुनिया में कुछ इस कदर गुम हुए कि अभी तक घर नहीं बसाया. परिचितों के लिए उनसे मुलाकात का एक ही अड्डा कैसरबाग में उनकी गुमटी है. बताते हैं कि दोस्तों, परिचितों से मिलने का बहाना कह लीजिये या आजीविका चलाने का एक साधन. यहीं पर परिचितों से मुलाकात हो जाती है. साथ ही, अक्सर उन्हें इसी दुकान पर किसी न किसी नाटक की पटकथा को धार देते हुए देखा भी जा सकता है.

“ये सुबह ज़िंदगी को शाम करने जा रहा है”

2000 के दशक की शुरुआत में अनिल मिश्रा ने 'Gandhi Math Bhetla' मराठी नाटक को मंच पर प्रस्तुत किया, जिससे उन्हें काफी प्रशंसा और पुरस्कार मिले. उनके मंचीय अभिनय से प्रेरित होकर 'Parrots' नाम की एक फ़िल्म भी बनी, जिसका दुनिया के 60 देशों में प्रीमियर हुआ है और उसने क़रीब 40 से ज़्यादा देशों में पुरस्कार जीते.

अनिल मिश्रा को बशीर बद्र और गोपाल दास ‘नीरज’ को पढ़ना भी काफ़ी पसंद है. उन्होंने लखनऊ के अपने पसंदीदा कलाकारों को याद करते हुए एक शेर सुनाया, जो बच्चों के हालात पर बात करता है और उनके दिल के क़रीब है. 

‘ये सुबह ज़िंदगी को शाम करने जा रहा है 

सुनहरे ख़्वाब सब नीलम करने जा रहा है 
जिसे अब इन दिनों स्कूल जाना चाहिए 
वो बच्चा दस बरस का काम करने जा रहा है.’  

देर से ही सही पर तसल्ली है कि गुरू जी जैसे लोगों पर सरकार की निगाह गई और उनके संघर्ष का पहचाना और सराहा गया. उम्मीद है कि दूसरे लोग भी उनसे प्रेरित होकर ख़ुद के साथ-साथ शहर की भी अलग पहचान बनाएंगे.

Source: knocksense