जिस तरह दुनिया की हर चीज़ को हमने एक बक्से में बंद कर दिया है ठीक उसी तरह पढ़ाई को भी हमने एक ऐसे बक्से में बंद कर दिया है जिसका मतलब रटना और एग्ज़ाम देने तक ही सिमित है. शुक्र है उन लोगों का जो इन बक्सों से बाहर निकलने की हिम्मत करते हैं और इस सिस्टम को चुनौती देते हैं. 

ठीक हैदराबाद के इस दंपति की तरह जो अपने बच्चों को स्कूलों में नहीं पढ़ा रहे हैं बल्कि वह 'रोड स्कूलिंग' कर रहे हैं. शब्द सुन कर सवाल आना लाज़मी है कि ये 'रोड स्कूलिंग' क्या है? 

ऐसी स्कूलिंग जिसमें घरवाले अपने बच्चों के साथ जगह-जगह यात्रा करते हैं और बच्चों को पढ़ाते हैं. एक ऐसी स्कूलिंग जो प्रैक्टिकल और जीवन के हर छोटे-बड़े पहलुओं को छूती है. 

गंगाधर कृष्णन और उनकी पत्नी राम्या लक्ष्मीनाथ अपनी जुड़वां बेटियों को रोड स्कूलिंग करवाने के लिए 90 दिन में 13,000 किमी, 15 राज्यों और 3 अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं की यात्रा कर चुके हैं. 

2018 में गंगाधर को एहसास हुआ कि जीवन में ट्रैवल करना कितना ज़रूरी है न केवल उनके लिए बल्कि उनकी बेटियों के लिए भी ताकि वो दुनिया को पारंपरिक स्कूल के नियमों से दूर एक नए और सच्चे चश्मे से देख सकें. 

अपनी बेटियों की रोड स्कूलिंग के लिए उन्होंने 2018 में अपनी 18 साल की कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ दी और [email protected] नाम से एक ट्रैवल स्टार्टअप की शुरुआत कर दी. उसके बाद से ही ये दम्पति अपनी बच्चियों के साथ देश के कोने-कोने में जाकर उनको रोड स्कूलिंग के द्वारा शिक्षा दे रहा है. वो हर दिन सोशल मीडिया पर अपने अनुभव शेयर कर रहे हैं और अन्य अभिवावकों से भी संपर्क बना रहे हैं. उन्होंने अपने बच्चों के लिए भी यही मार्ग चुना है. 

उन्होंने पिछले साल ही अपनी नौ वर्षीय जुड़वां बेटियों अनन्या और अमूल्य - को स्कूल से निकलवाकर, इन यात्राओं के माध्यम से शिक्षित करने का फ़ैसला किया. 

चेरापूंजी में, लड़कियों ने प्राकृतिक वॉटर साइकिल के बारे में सीखा. 

अरुणाचल प्रदेश में, उन्होंने एक खेत की जुताई की और टिकाऊ खेती-बाड़ी के बारे में सीखा. 

पूर्वोत्तर के एक दूर-दराज के गांव में जब वो एक अनजान जगह के बीच में फंस गए थे तब कुछ ग्रामीणों ने उनकी मदद की थी. जिससे उन्होंने हमेशा दयालु और अच्छे इंसान होने की सीख ली. 

यात्रा के दौरान परिवार न तो कोई प्लास्टिक का सामान इस्तेमाल करता है और न ही फ़ास्ट या जंक फ़ूड खाता है. गंगाधर कहते हैं, 'हम अपने पानी के बर्तन साथ लेकर चलते हैं जिन्हें हम रास्तों में भर लेते हैं. पूर्वोत्तर में हमने जिन इलाकों में यात्रा की वहां हमने सार्वजनिक नलों, नदियों से पानी पिया या बस वहां के घरों से पानी भर लिया. हम वही खाते हैं जो स्थानीय लोग खाते हैं ऐसे में ये लड़कियों को वहां की संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखाता है.' 

महामारी ने अस्थायी रूप से उनकी यात्रा को रोक दिया लेकिन उन्होंने दोबारा ट्रैवल किया. पिछले महीने, परिवार ने हैदराबाद से मैसूर तक की अपनी पहली संपर्क रहित यात्रा शुरू की थी. 

हमारी तरफ़ से आपके परिवार को आगे की यात्राओं के लिए All The Best!