देशभर में कोरोना वायरस के कारण हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं. भारत में इस ख़तरनाक वायरस से अब तक कुल 1251 लोग संक्रमित हो चुके हैं. वहीं 39 लोगों की मौत भी हो चुकी है.

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भारत में लगातार हो रही मौतों के चलते लोगों के बीच अब इस वायरस को लेकर एक अलग ही ख़ौफ़ नज़र आ रहा है. इन दिनों यूपी के एक गांव लोग एक नहीं बल्कि दो-दो कोरोना से जूझ रहे हैं. अब आप सोच रहे होंगे 'दो-दो कोरोना' ऐसा कैसे भई...?

दरअसल, यूपी के सीतापुर ज़िले में एक गांव ऐसा भी है, जिसका नाम ही 'कोरोना' है. लखनऊ से क़रीब 100 किमी दूर स्थित 'कोरोना गांव' के लोगों को इस समय कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. बिना किसी बात के लोगों की बातें सुननी पड़ रही हैं. अपने गांव के इस अनोखे नाम की वजह से उन्हें उपहास का पात्र भी बनना पड़ रहा है.

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एक महीने पहले तक जिस 'कोरोना गांव' के लोग अपने गांव का नाम फ़क्र से लिया करते थे. वो अब लोगों को अपने गांव का नाम बताने से भी डर रहे हैं. अन्य गांवों के लोग 'कोरोना गांव' के लोगों के साथ भेदभाव कर रहे हैं, उनसे दूर भाग रहे हैं, उन पर हंस रहे हैं. गांव का नाम सुनते ही लोग काट देते हैं फ़ोन. हालांकि, गांव में एक भी व्यक्ति कोरोना संक्रमित नहीं है.

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ANI से बातचीत में 'कोरोना गांव' वाले बताते हैं कि, जब से कोरोना वायरस फैला है, तब से ही हमें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है. बाहरी लोग हमसे दूरी बना लेते हैं. गांव से बाहर कहीं सामान लेने भी जाते हैं तो गांव का नाम पूछा जाता है. जबकि कुछ लोग तो उनका मज़ाक उड़ाने लगते हैं.

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'कोरोना गांव' के राजन कुमार का कहना है कि, जब हम लोगों को बताते हैं कि हम कोरोना से हैं, तो वो हमसे बचते हैं और दूर रहने के लिए कहते हैं. वो ये नहीं समझते कि कोरोना एक गांव है ना कि जानलेवा कोरोना वायरस से संक्रमित कोई शख्‍स'.

क्यों ख़ास है कोरोना गांव?

दरअसल, कोरोना गांव 88 हज़ार ऋषियों की तपोभूमि 'नैमिषारण्य' की 84 कोसीय परिक्रमा वाले मार्ग पर पड़ता है. होली के पंद्रह दिन पहले नैमिषारण्य से शुरू होने वाली 84 कोसीय परिक्रमा का पहला पड़ाव 'कोरोना गांव' ही होता है. यहां पर द्वारकाधीश का प्राचीन मन्दिर भी है, जिसमें परिक्रमा के समय लाखों श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं. 'कोरोना गांव' धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से काफ़ी समृद्ध है. इस छोटे से गांव की आबादी महज 8 हज़ार है. ब्राह्मण और यादव बहुल इस गांव के लोग खेती पर निर्भर हैं.

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'कोरोना गांव' धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से काफ़ी समृद्ध है. इस छोटे से गांव की आबादी महज 8 हज़ार है. ब्राह्मण और यादव बहुल इस गांव के लोग खेती पर निर्भर हैं.