बीते गुरूवार, देहरादून के गवर्नमेंट दून मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (GDMCH) में एक गर्भवती महिला की फ़र्श पर डिलिवरी हुई, और हॉस्पिटल की अनदेखी के कारण जच्चा-बच्चा दोनों की मौत हो गई, ये ख़बर उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर हालत और अनदेखी को बयां कर रही है.

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27 वर्षीय गर्भवती महिला को हॉस्पिटल में 6 दिन तक बेड न मिलने के कारण कॉरिडोर के फ़र्श पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा और बच्चे के जन्म के कुछ ही देर बाद ही उपचार न मिलने के कारण मां और बच्चे दोनों की मौत हो गई. इसके बाद मृतक महिला के परिवार और हॉस्पिटल में मौजूद लोगों ने डॉक्टरों और स्टाफ़ पर अनदेखी और लापरवाही का आरोप लगाते हुए सीएमएस त्रिवेंद्र सिंह रावत का घेराव कर किया.

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आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सुरेश सिंह राणा, जो मसूरी में एक मज़दूर की तरह काम करते हैं और टिहरी के एक गांव धनसाड़ी बासर के निवासी हैं. सुरेश पांच दिन पहले वहां से पनी पत्नी सुचिता को डिलीवरी के लिए इस अस्पताल में लेकर आये थे.

TOI के अनुसार,

सुरेश ने बताया कि प्रसव के बाद बच्चा, जो कि एक लड़का था करीब 20 मिनट तक तड़पता रहा, पर हॉस्पिटल के स्टाफ़ ने कुछ नहीं किया. इसके साथ ही सुरेश ने कहा, 'मैंने उस वक़्त ड्यूटी पर जो नर्स थी, उसको पत्नी की पीड़ा और बच्चे के बारे में बताया, लेकिन उसने अनसुना कर दिया और मेरी पत्नी की मदद करने के बजाए अपने मोबाइल में बिज़ी हो गई.

वहीं हॉस्पिटल प्रशासन का कहना है,

गर्भवती महिला को लेबर रूम में बेड दिया गया था. वो बहुत कमज़ोर थी और उसमें ख़ून की भी बहुत कमी थी. इसके साथ ही हॉस्पिटल के महिला विंग की सीएमएस, डॉ. मीनाक्षी जोशी ने कहा कि महिला के पेट में मारा हुआ बच्चा था. हमने प्रसव से पहले उसकी जांच की थी. हमने उसके 2 यूनिट ब्लड भी चढ़ाया था और जब हम तीसरी यूनिट चढ़ाने लगे तो वो लेबर रूम से बाहर चली गई. शायद उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो बेचैन थी. इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि तीन सदस्यों की एक कमेटी इस पूरी घटना की जांच करेगी.

जबकि सुरेश सिंह राणा ने हॉस्पिटल के इस बयान को सिरे से नकारते हुए कहा कि ये सब झूठ बोल रहे हैं. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी को कोई बेड नहीं दिया गया था और पिछले 5 दिनों से वो दर्द में महिला विंग के फ़र्श पर ही लेटी थी. मुझसे बोला गया कि आप इनको दूसरे हॉस्पिटल ले जाओ पर मेरे पास पैसे नहीं थे इतने.

राणा की इस बात की पुष्टि हॉस्पिटल में एडमिट दूसरे मरीज़, उसके घर वालों के साथ धरना दे रहे कई लोगों ने की.

मरीज़ ने बताया, मैंने देखा था कि वो महिला कुछ दिनों से कॉरिडोर में ही लेटी हुई थी. प्रसव के बाद जब सुरेश ने मदद के लिए स्टाफ़ को बुलाया, तो कोई भी उसकी मदद के लिए नहीं आया.

इस घटना से गुस्साए लोगों का गुस्सा अस्पताल की गैर-ज़िम्मेदारी और अनदेखी के कारण जच्चा-बच्चा की मौत के बाद फूट पड़ा और उन्होंने अस्पताल में हंगामा कर दिया, जिसके बाद हालत पर काबू पाने के लिए पुलिस को आना पड़ा. पुलिस के अनुसार कई प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ़ ने देर रात गर्भवती को शौचालय तक जाने के लिए महिला को स्ट्रेचर तक नहीं उपलब्ध करवाया गया. वहीं कुछ ने कहा कि हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने ये बोल कर महिला का इलाज करने से मना कर दिया कि उसके पास से बदबू आ रही है.

TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2017 में प्रसव और प्रसव के बाद महिला और बच्चे के रहने वाले वार्डस को इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन न होने के कारण 5 महीनों के लिए बंद कर दिया था. नतीजन, गर्भवती महिलायें और कई जच्चा-बच्चा कड़कड़ाती ठण्ड में ज़मीन पर लेटने को मजबूर थीं.