एक्टिंग का सबसे बड़ा नियम होता है कि आप चाहे Frame में एक सेकंड के लिए ही आयें, आपको उसमें भी कमाल कर के दिखाना है. इस नियम को निभाने में अच्छे-अच्छे एक्टर्स की हालत ख़राब हो जाती है. अब हर कोई सतीश शाह नहीं बन सकता, जो मुर्दे की एक्टिंग भी करे, तो उसमें भी जान फूंक दे. और हर कोई रत्ना पाठक शाह सा भी नहीं हो सकता, जो परंपरागत रोल के विपरीत जाते हुए भी एक्टिंग करे, तो उसे अमर बना दे.

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एक्टिंग की दुनिया में रत्ना पाठक शाह का नाम बोलता है. इस नाम में भले ही सलमा-सितारे न लगे हों, लेकिन इसकी सादगी अपने आप आपको आकर्षित कर देगी. साराभाई Vs साराभाई का यूं तो हर किरदार जानदार था, लेकिन उन्हें जोड़ने की कड़ी थी माया साराभाई बनी रत्ना पाठक शाह. उनकी ज़िन्दगी पर फ़िल्मी दुनिया का प्रभाव पहले से ही था, मां दीना पाठक और बहन सुप्रिया पाठक के साथ उन्होंने एक्टिंग की बारीकी सीखी थीं. पति नसीरुद्दीन शाह के साथ एक्टिंग का नेक्स्ट लेवल क्रॉस किया था.

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इसे बॉलीवुड का Bad Luck कहें या Bad Decision, कि उसने रत्ना पाठक शाह की एक्टिंग को पूरा मौका नहीं दिया. ये दावे के साथ कहा जा सकता है कि वो अपने ज़माने की और पिछले ज़माने की Popular हीरोइन्स से बहुत बेहतर हैं और हमेशा रहेंगी. ये साबित है उनकी चॉइस ऑफ़ फ़िल्म्स और उनकी एक्टिंग से. उन्होंने अपने इंटरव्यू में कई बार ये बात कही है कि वो दोयम दर्जे का काम करने से बेहतर काम न करना पसंद करेंगी.

चलिए, एक बार Compare करते हैं उनकी कुछ फ़िल्म्स और उनके किये कुछ रोल्स को, जो अगर कोई और करता, तो क्या उससे न्याय कर पाता?

कपूर एंड संस

इस फ़िल्म ने Homosexuality के Issue पर बात करने की हिम्मत दिखाई थी और पहली बार बॉलीवुड का मेनस्ट्रीम हीरो एक Gay दिखाया गया था. फ़िल्म में सभी की एक्टिंग की तारीफ़ की गयी, ख़ासकर ऋषि कपूर की. लेकिन जो रोल रत्ना पाठक शाह ने निभाया, उसे शायद कोई छू भी नहीं पाता. वो औरत जिसका पति उसे धोखा दे रहा है, वो मां जो अपने दोनों बेटों की प्रॉब्लम से जूझ रही है, जिसे पता है कि उसका बेटा गे है. 

जो भी एक्टर इस रोल को करता, उसे पति से मिली बेफ़ायी की Frustration और अपनी ममता दोनों एक साथ दिखानी थी. ये आसान इसलिए लग रहा है क्योंकि रत्ना ने इसे कर दिखाया. इसके लिए अंग्रेज़ी का फ्रेज़ है, 'She Nailed It'. दिमाग़ में और कोई एक्टर नही आता, जो बिना ओवरएक्टिंग किये इसे कर पाता. या तो वो दुखयारी मां बन जाती, या सिर्फ़ फ़िल्म का एक किरदार बन कर Sideline हो जाती. लेकिन रत्ना पाठक शाह ने जो किया, वो हमारे सामने है.

माया साराभाई, साराभाई Vs साराभाई

"मोनिशा Tetra Pack देने वाले आदमी को भी बलती है, 'भैय्या थोड़ा और दे दो न'."

इस शो के इतने दीवाने हैं, कि सीधे सवाल ठोका जा सकता है, रत्ना पाठक शाह के अलावा कोई एक्ट्रेस बन सकती है माया साराभाई? शायद कोई नहीं!

ये रोल ऐसा था, जिसमें माया विलेन भी बन सकती थी क्योंकि वो मिडिल क्लास का मज़ाक उड़ाती है और कोई भी टिपिकल अपर क्लास सोशलाइट की झलक आ सकती थी. लेकिन रत्ना पाठक शाह ने एक-एक इमोशन को ऐसे पकड़ा कि सब उनके डायलॉग आज भी नहीं भूलते. सास का रोल, जब तक कि वो मजबूर सास न हो, तब तक अच्छा नहीं लगता, ये सास Funny भी थी और शोशेबाज़ी से भरी हुई भी. फिर भी इस किरदार से सबको प्यार हो गया.

जाने तू या जाने न

इस फ़िल्म को लगभग हर किसी ने पसंद किया. थोड़ा सा दिमाग़ पर ज़ोर लगाईये, इमरान खान की मम्मी का रोल कोई इनसे अच्छा कर सकता था? फ़िल्म में पाठक इतनी Chilled Out मां बनी थी, फिर भी उस किरदार की Complex Vibe को उन्होंने थामे रखा. कई लोग कहेंगे कि इस रोल में कुछ ख़ास नहीं था, लेकिन अगर आप फ़िल्म और एक्टिंग की थोड़ी भी समझ रखते हैं, तो उनकी एक्टिंग को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते. सोच कर देखिये, ये रोल अगर कोई और एक्ट्रेस करतीं, तो क्या रोल वैसा ही रह जाता?

मंडी

श्याम बेनेगल की फ़िल्म थी मंडी. शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, ओम पुरी, मेजर रोल्स में थे और उस फ़िल्म के कुछ सीन्स में कहीं-कहीं पर दिखी थी रत्ना पाठक शाह. याद आयीं? मालती याद है, जिसकी शादी सईद जाफ़री के बेटे से करवाई जाती है. ओपनिंग शॉट में ही उसकी मां उसे ज़बरदस्ती तैयार कर रही होती है और मालती कहती है कि उसे शादी नहीं करनी. ऐसे देख कर लगता है कि इतना सा रोल कोई भी कर सकता था, लेकिन शायद कोई और करती, तो वो बात शायद ही मिलती.

कोई और आया दिमाग़ में, जो इस रोल को कर पाता?

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The Perfect Murder

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ये फ़िल्म एक मर्डर पर बनी थी, मुंबई के एक पारसी परफ़ेक्ट का मर्डर हो जाता है. इन्वेस्टीगेशन की ज़िम्मेदारी मिलती है इंस्पेक्टर घोटे को, जो अपनी नौकरी से वैसे ही परेशान है. उसकी वाइफ़ प्रतिमा एक बेहतर ज़िन्दगी चाहती है, वो अपने पति की नौकरी से परेशान है. प्रतिमा के रोल में ढेर सारे इमोशंस हैं, कभी वो अजीब सी ज़िद करने लगती है, कभी वो अपनी क़िस्मत को कोस रही होती है. कभी खामोशी से आने वाले कल के बारे में सोच रही होती है. ये प्रतिमा थी रत्ना पाठक शाह. एक पल के लिए इस रोल को दीप्ति नवल निभा सकती थी, पर रत्ना पाठक शाह को इस रोल में देखने के बाद किसी और से ऐसी एक्टिंग की उम्मीद रखना बेईमानी हो जाती.

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ये बात थी रोल्स की, आप फ़िल्मों को लेकर उनके चुनाव को देखेंगे, तो उसमें भी एक साहसी एक्टर की झलक साफ़ दिखेगी.

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चाहिए वो लिपस्टिक अंडर माय बुरखा हो या फिर निल बट्टे सन्नाटा हो, उन्होंने बेहतरीन स्क्रिप्ट को हमेशा स्टारकास्ट से ज़्यादा महत्त्व दिया. इस उम्र में भी अगर कोई एक्टर अपनी चॉइस ऑफ़ फ़िल्म्स को लेकर इतना सजक और सतर्क है, तो उससे बस एक ही बात सामने आती है, उसके बेहतरीन एक्टर होने की.

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कहते हैं, कुछ रोल्स किसी ख़ास एक्टर के लिए बने होते हैं. लेकिन एक एक्टर कुछ रोल्स को अपने लिए बना ले तो? रत्ना पाठक शाह वो एक्टर हैं. उन्हें पर्दे पर और जादू करते हुए देखना है.