बहुत कम ही भारतीय इस बात को जानते होंगे कि अंग्रेज़ भी रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के कायल थे. 1857 की क्रांति के वक़्त अंग्रेज़, लक्ष्मीबाई के विरुद्ध खड़े ज़रूर थे लेकिन वो झांसी की रानी की बहादुरी, चतुराई के कायल थे. उनका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था और बहुत से अंग्रेज़ अफ़सर उनके व्यक्तित्व से भी प्रभावित थे.

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Sir Hugh Rose ने लक्ष्मीबाई के लिए लिखा था,

वो विद्रोहियों की सरदार थीं

Sir Hugh ही अंग्रेज़ों की फ़ौज लेकर रानी का सामना करने आये थे.

भारत के पहले वायसरॉय, Lord Canning ने अपने निजी कागज़ात में रानी के लिए लिखा,

वो पुरुषों की तरह कपड़े पहनती थी और उन्हीं की तरह घुड़सवारी करती थी. बड़ी ख़ूबसूरत आंखें और काया थी उनकी.

विवाह बाद, मन्नू बनी लक्ष्मीबाई

1842 में मन्नू का विवाह, झांसी के राजा गंगाधर राव से हुआ और मन्नू लक्ष्मीबाई बन गईं. 1851 में रानी ने पुत्र दामोदर राव को जन्म दिया, जिसने जन्म के 4 महीने बाद ही दुनिया को अलविदा कह दिया. पुत्र की मृत्यु के बाद 1853 में गंगाधर राव ने अपने दूर के भाई, आनंद राव को गोद लेने का निर्णय लिया, जिन्हें वो दामोदर राव ही बुलाते थे.

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अंग्रेज़ों ने झांसी की रानी को उन्हीं का किला छोड़ने का सुनाया हुक़्म

अंग्रेज़ों की Doctrine of Lapse पॉलिसी के कारण भारतीय राजा आसानी से संतानें गोद नहीं ले सकते थे. इस क़ानून के कारण गंगाधर राव को झांसी में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट Major Robert Ellis की देख-रेख में गोद लेने की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी. Ellis के ज़रिये गंगाधर राव ने अपनी वसीयत तब के गवर्नर जनरल Lord Dalhousie को भिजवाई. इस वसीयत के अनुसार, वयस्क होने के बाद दामोदर राव झांसी का अगला राजा बनता और उसके वयस्क होने तक झांसी की बागडोर लक्ष्मीबाई के हाथों में रहनी थी.

Ellis ने दस्तावेज़ अपने अग्रणी John Malcolm को सौंपे. Malcolm लक्ष्मीबाई को कोई पद नहीं सौंपना चाहता था. Lord Dalhousie की अलग ही मंशा थी, उन्होंने राजा गंगाधर राव की वसीयत को मानने से इंकार कर दिया और कैप्टन Alexander Skene को झांसी की बागडोर संभालने भेज दिया.

दिसंबर 1853 में लक्ष्मीबाई ने Major Ellis द्वारा Malcolm को दरख़्वास्त भिजवाई. Malcolm ने दरख़्वास्त आगे नहीं भिजवाई. दो महीने बाद रानी ने आख़िरी बार अंग्रेज़ अफ़सरों से बातचीत की कोशिश की जिसका कोई नतीजा नहीं निकला.

मार्च, 1854 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने रानी को झांसी का किला छोड़ने का हुक्म भेज दिया. उनके गुज़ारे के लिए 5000 रुपये मासिक पेंशन का भी प्रस्ताव रखा गया. अंग्रेज़ों ने दामोदर दास को भी राजा मानने से इंकार कर दिया.

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ऑस्ट्रेलिया के वक़ील ने लंदन में रखा रानी का पक्ष

रानी अंग्रेज़ों की मंशा समझ चुकी थी और उन्होंने मदद के लिए John Lang को बुलावा भेजा.

रानी से पूरी मुलाक़ात का ज़िक्र अपनी किताब,

"Wanderings in India And Under Sketch of Life In Hindustan" में किया है. 22 अप्रैल 1854 को John Lang ने लंदन की अदालत में लक्ष्मीबाई का पक्ष रखा लेकिन वो असफ़ल रहे.

1857 की क्रांति 31 मई को शुरू होनी थी. लेकिन समय से 3 हफ़्ते पहले 10 मई को ही कोलकाता में विद्रोह शुरू हो गया.

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7 जून को क्रांतिकारी झांसी पहुंचे और लक्ष्मीबाई से 3 लाख रुपये मांगे, जो रानी ने उन्हें दे दिये. अंग्रेज़ों ने रानी को पत्र भेजकर इतनी बड़ी राशि देने का कारण पूछा जिसके जवाब में रानी ने कहा कि ऐसा उन्होंने सबकी सुरक्षा के लिए किया है. इतिहासकारों का कहना है कि रानी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा किया था.

विद्रोहियों के भय से ईस्ट इंडिया कंपनी के लोगों ने झांसी छोड़ दिया और झांसी फिर से रानी के अाधीन हो गई.

इस सबके बीच महाराष्ट्र के सदाशिव राव ने झांसी से 30 मील दूर कथूरा किले पर कब्ज़ा कर लिया और आस-पास के गांवों को अपनी संपत्ति घोषित कर दिया. कुछ सरदार रानी पर प्रश्न उठाने लगे. विद्रोह से पहले ही रानी ने सदाशिव को युद्ध में हराया.

अंग्रेज़ों से युद्ध

जनवरी 1858 में Hamilton ने अंग्रेज़ सिपाहियों के साथ झांसी का रुख किया. अंग्रेज़, रानी को आत्मसमर्पण के लिए कह रहे थे, रानी तैयार नहीं थी.

23 मार्च 1858 को अंग्रेज़ फौजों ने झांसी पर धावा बोल दिया. 30 मार्च को बमबारी कर अंग्रेज़ किले में प्रवेश करने में सफ़ल हो गए. तभी तांत्या टोपे 20000 विद्रोहियों को लेकर वहां पहुंचे और अंग्रेज़ों से भीषण युद्ध होने लगा. 3 अप्रैल तक युद्ध चला और फिर अंग्रेज़ झांसी में प्रवेश करने में सफ़ल हो गए.

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युद्ध की हवा को भांपते हुए रानी ने आख़िरी उम्मीद दामोदर राव को अपनी पीठ पर बांधा और छोटी सी सेना लेकर झांसी से निकल गईं.

झांसी से निकलकर वे कल्पी और फिर ग्वालियर पहुंची. 17 जून की सुबह रानी अंग्रेज़ों से अपनी आख़िरी युद्ध के लिए तैयार हुईं.

मृत्यु को लेकर भी है मतभेद

जन्म की तरह ही रानी की मृत्यु को लेकर भी अलग-अलग मत हैं. Lord Canning के दस्तावेज़ों को ही सही माना जाता है. Lord Canning के मुताबिक, रानी दोनों हाथों में तलवार लिये, घोड़े की रस्सी दांतों में दबाये युद्ध कर रही थीं. एक सिपाही ने उन्हें पीछे से गोली मारी. रानी ने घूमकर उस पर गोली चलाई लेकिन वो बच गया और उसने अपनी तलवार रानी के सिर पर मारी और रानी वीरगति को प्राप्त हुईं.

ऐसी वीरता, ऐसी निडरता अनमोल है, अद्वितीय है. झांसी की रानी को हमारा शत-शत नमन.