इसे NCERT का आभार ही कहिये, जो स्कूल के दिनों में ही उसने किताबों में खुशवंत सिंह की कुछ कहानियों को शामिल करके बच्चों के लिए एक साहित्यिक ज़मीन तैयार की. खुशवंत की कहानी अन्य कहानीकारों से इसलिए भी अलग हैं, क्योंकि खुशवंत सिंह की कहानियां लड़की और शराब के ज़रिये पाठकों के लिए पहले ही ऐसी ललक को पैदा करती है, जिसमें वो न चाहने के बावजूद ख़ुद-ब-ख़ुद खोता चला जाता है.

बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में खुशवंत सिंह ने ख़ुद के बारे में कहा था कि ' मैं जिस्म से तो बूढ़ा हूं, लेकिन आंख तो अब भी बदमाश है और मेरा दिल अब भी जवान ही है.' खुशवंत सिंह की ये बेबाकी सिर्फ़ उनके इंटरव्यू तक ही नहीं, बल्कि उनके लेखन में भी साफ़ दिखाई देती है.

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पत्रकार से उपन्यासकार और लेखक बने खुशवंत सिंह का जन्म 2 फरवरी 1915 को पंजाब के हदाली (आज पाकिस्तान का हिस्सा) गांव में हुआ. बंटवारे के बाद उन्होंने हिंदुस्तान को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहां से पत्रकारिता में अपने करियर की शुरुआत की. पत्रकार के तौर पर काम करते हुए भी खुशवंत सिंह ने अपने लिए साहित्यिक कोना बनाया, जहां से उन्होंने 'ट्रेन टू पाकिस्तान', 'The Company of Women' जैसे उपन्यास लिखे.

आज हम खुशवंत सिंह के बारे में कुछ ऐसी बातें ले कर आये हैं, जो उन्हें एक शानदार लेखक होने के साथ-साथ ज़िंदादिल इंसान भी बनाते हैं.

सेक्स -शराब और खुशवंत

खुशवंत सिंह ने 80 से ज़्यादा किताबें लिखी, जिनमें उपन्यास से ले कर लघु कहानियां शामिल थी. उनकी ज़्यादातर कहानियों में सेक्स और उसकी चाहत अपनी मौजूदगी दर्ज करा ही लेती थी. शायद यही वजह थी कि वो ख़ुद को दिल्ली का दिलफेंक बूढ़ा भी कहा करते थे. हालांकि इस बेबाकी की वजह से खुशवंत कई बार कॉन्ट्रोवर्सी में घिरे, पर इसके बावजूद उनकी ज़िंदादिली में कोई कमी नहीं आई.

शाम होते ही उनके घर यारों-दोस्तों का जमावड़ा शुरू हो जाता था. टेबल पर नमकीन, सलाद और खाने की तमाम चीज़ों के साथ शराब परोसी जाती थी. शराब के जाम अभी दोस्तों के गले से नीचे उतरते ही होते कि खुशवंत सिंह महफ़िल छोड़ देते. घर पर चलने वाली महफ़िलों को ले कर खुशवंत सिंह का एक फंडा साफ़ था कि पार्टी ज़्यादा से ज़्यादा आधे घंटे की होनी चाहिए.

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इस बारे में खुशवंत सिंह ने एक इंटरव्यू में ख़ुद कहा था कि 'जिस आदमी ने 80 से ज़्यादा क़िताबें लिखी हों, उसके पास ऐय्याशी के लिए बहुत कम वक़्त होता है. मेरे पास भी वक़्त की बहुत कमी है. हर शाम मेरे पास कई ख़ूबसूरत लड़कियां आती हैं. उनके आने से अपने-आप महफ़िल जम जाती है, पर जैसे ही कोई 15-20 मिनट से ज़्यादा रुक जाए, तो मैं ख़ुद ही कहता हूं कि भई अब आप लोग जाइए, क्योंकि मुझे मेरी किताबों के पास लौटना है.'

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वक़्त ने भी ख़ुद को खुशवंत सिंह के हिसाब से ढालना सीख लिया था.

इसे ऐसे समझिये कि खुशवंत सिंह ने अपने हर काम का एक निश्चित वक़्त तय कर रखा था, जिसके साथ वो कोई समझौता नहीं करते थे. शायद उनके इसी वक़्त ने उन्हें 'डर्टी ओल्ड मैन' का ख़िताब दिलाया था. इसी वक़्त को लेकर उनका एक किस्सा मशहूर है कि एक नामी-गिरामी चैनल के पत्रकार ने खुशवंत सिंह को फ़ोन करके इंटरव्यू के लिए वक़्त मांगा. खुशवंत सिंह ने भी इंटरव्यू के लिए हां कर दी और उसे एक निश्चित समय पर बुलाया. अगर आप दिल्ली के हैं, तो इसके ट्रैफ़िक को अच्छे से पहचानते होंगे, जो किस समय, कहां लग जाए कोई नहीं जानता. पत्रकार महोदय भी एक ऐसे ही ट्रैफ़िक में फंस गए और इंटरव्यू के लिए 5 या 6 मिनट लेट पहुंचे.

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पर किसी दीन को न मानने वाले खुशवंत सिंह वक़्त के बड़े पक्के थे. उन्होंने पत्रकार को ये कह कर लौटा दिया कि आप लेट हैं और मुझे अब दूसरे काम हैं. ख़ैर अगले दिन पत्रकार साहब समय से पहले पहुंचे और तय वक़्त पर जा कर खुशवंत सिंह का इंटरव्यू लिया.

इस बारे में खुशवंत सिंह भी कहते हैं कि 'मेरे अंदर किसी चीज़ को छुपाने की हिम्मत नहीं है. मैं जो कहता हूं खुल्लम-खुल्ला कहता हूं. मेरा कोई दीन-ईमान धरम-वरम कुछ नहीं है. बस जो है यही सच है.' 99 साल की उम्र में भी उनके हर काम का वक़्त तय था. वो हर सुबह 4 बजे उठ जाते थे और लिखने के लिए बैठ जाते थे.

मौत का स्वागत

खुशवंत सिंह का देहांत 99 वर्ष की आयु में हुआ, पर मौत का इंतज़ार करने के बजाय वो उसका स्वागत चाहते थे. उम्र के जिस पड़ाव पर लोग धर्म की शरण लेते हैं उस उम्र में भी खुशवंत सिंह लिखते रहे. अपने आखिरी क्षणों में भी वो नियमित रूप से अख़बारों के लिए लिखते रहे. उनकी राजनीतिक टिप्पणियां तब भी सरकार के तल्ख़ियों का सबब बनी रही. उम्र के साथ जिस तरह से लोगों में संजीदापन आता जाता है. खुशवंत सिंह का व्यक्तित्व बिलकुल उसके उल्ट मज़ाकिया होता गया. 'ट्रेन टू पाकिस्तान' और 'कंपनी ऑफ वूमन' जैसी कहानियों की जगह अब संता-बंता ने ले ली थी, जो लोगों को हर दिन एक नए रूप में गुदगुदाने का काम कर रही थी.

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ख़ैर ऐसी ही कई बातें खुशवंत सिंह को ले कर हैं, जो आज सिर्फ़ याद बन कर रह गई हैं. यदि आपके पास भी उनकी कोई ऐसी ही याद हो, तो हमसे शेयर करना न भूलें, क्योंकि किस्से तो होते ही कहने के लिए हैं.