इश्क़ की पहली किताब को पढ़ते हुए, रातों को जागते 'आफ़रीन-आफ़रीन' सुनना हो, या दिल टूटने के बाद 'सांसों की माला' को गुनगुनाना हो. नुसरत फ़तेह अली ख़ान एकलौती ऐसी आवाज़ की शख़्सियत हैं, जो अपनी मौत के 20 साल बाद भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं.

हिंदुस्तान में भले ही नुसरत साहब के कदम बाद में पड़े हों, पर उनकी आवाज़ यहां पहले ही अपने पैर फैला चुकी थी. नुसरत साहब भी हिंदुस्तान से कुछ कम मोहब्बत नहीं करते थे. बॉलीवुड के बुलावे पर हिंदुस्तान आने से पहले ही नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने जावेद अख़्तर के साथ काम करने की शर्त रख दी.

जावेद और नुसरत की जोड़ी ने भी लोगों को निराश नहीं किया और मिलकर पहली एल्बम 'संगम' निकाली. ये वही एल्बम थी, जिसमें 'आफ़रीन-आफ़रीन' से ले कर 'मैं और मेरी आवारगी' जैसी ग़ज़लें मौजूद थीं. नुसरत साहब की आवारगी हिंदुस्तान में सिर्फ़ एल्बम तक नहीं बंधी, बल्कि पर्दे पर भी उन्होंने आवाज़ से कभी 'दूल्हे का सेहरा सजाया', तो कभी 'दिल्लगी को भुलाने की कोशिश की.

इस दुनिया से मसरूफ़ होते समय नुसरत साहब ने अपनी विरासत अपने बेटे राहत फ़तेह अली ख़ान के हाथों में सौंपी, जो आज बखूबी उसे आगे बढ़ा रहे हैं.

हम आपको उनकी एक मशहूर ग़ज़ल के साथ छोड़े जा रहे हैं, क्या पता फिर इस तरह का मज़ा आये न आये.