हमारे समाज में अकसर यह देखा जाता है कि जब किसी लड़की के साथ मनचले छेड़छाड़ करते हैं, तो लोग उसे नज़रअंदाज करते हुए आगे निकल जाते हैं या फिर वो ये सोचते हैं कि बेकार में इस पचड़े में पड़ने से उनका क्या फ़ायदा होगा. शायद ऐसी मानसिकता वाले लोगों के कारण ही मनचलों के हौसले बुलंद हो जाते हैं.

दरअसल, खेल के मैदान पर अपना दम दिखाने वाली ओलंपियन कृष्णा पूनिया ने जांबाज़ी का जबरदस्त उदाहरण प्रस्तुत किया है. राजस्थान के चुरू में एक मनचले को ओलम्पियन कृष्णा पूनिया ने ऐसा सबक सिखाया कि ऐसी मानसिकता रखने वालों के होश ही उड़ जाएंगे.

नये साल के दिन राजस्थान के चुरू जिले में अपनी कार में बैठी कृष्णा भीड़भाड़ वाली रेलवे क्रॉसिंग पर ट्रेन गुज़र जाने का इंतज़ार कर रही थीं, तभी उनकी नज़र दो भयभीत किशोरियों पर पड़ी. देखकर उन्हें एहसास हुआ कि मोटरसाइकिल पर सवार तीन मनचले लड़के दो बहनों के साथ सरेआम छेड़छाड़ कर रहे हैं. वे मनचले दोनों बहनों को काफ़ी गंदे तरीके से परेशान कर रहे थे.

अब होना क्या था, इतना देखते ही लंबी-चौड़ी कद की कृष्णा अपनी कार से नीचे उतरीं और उन मनचलों को मज़ा चखाना शुरू किया. कृष्णा के इस कदम से वो इतने डर गये कि खरगोश की तरह वहां से भाग निकले. मगर कृष्णा उन्हें बिना सबक सिखाए कहां मानने वाली थीं.

39 वर्षीय कृष्णा ने एकदम फ़िल्मी अंदाज़ में उन मनचलों का पीछा किया. महज 50 मीटर की ही भागदौड़ हुई होगी कि कृष्णा ने उन मनचलों को धर दबोचा और बाद में पुलिस के हवाले कर दिया. बॉलीवुड स्टाइल में घटी ये घटना करीब शाम 4 बजे की है.

2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता कृष्णा पूनिया के मुताबिक, जब मैंने उन दो लड़कियों को मनचलों द्वारा परेशान करते हुए देखा, तो मैंने सोचा कि ऐसी हरक़त मेरी बेटियों के साथ भी हो सकती है. बस यही कारण है कि मुझे मनचलों को सबक सिखाने के लिए उनके पीछे जाना पड़ा.

कृष्णा ने आगे कहा, 'घटनास्थल से पुलिस थाने की दूरी महज 2 मिनट की थी, मगर पुलिस को यहां पहुंचने में काफ़ी समय लग गया. पुलिस को बुलाने के लिए मुझे दो बार फ़ोन करना पड़ा. तब जाकर पुलिस घटनास्थल पर पहुंच पाई. जब पुलिस इतना देर लगाती है, तो वो कैसे महिला सुरक्षा का भरोसा दे सकती है?'

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गौरतलब है कि डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया भारत की बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक रही हैं. वो साल 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं. इसके अलावा दोहा और गुआंजू एशियन्स गेम्स में उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया था. पुनिया 2008 बीजिंग ओलंपिक और 2012 लंदन ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.

बहरहाल, हमारे समाज की यह समस्या है कि सभी आवाज़ उठाने और विरोध करने के बदले मूक दर्शक बने रहना पसंद करते हैं. इसके अलावा वो ये मान लेते हैं कि वो मेरी बेटी थोड़े न है, जो मैं कुछ करने जाऊं. लेकिन याद रहे, जिस दिन आपकी बेटी के साथ ऐसा होगा, वहां मौजूद भीड़ भी आपकी तरह ही सोचेगी. इसलिए अभी भी समय है सुधर जाइये और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझें.

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