बीते गुरूवार को रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने 100 रुपये का नया नोट जारी किया है. इस नए नोट का रंग लैवेंडर है. वहीं नोट के पीछे 'Rani Ki Vav' रानी की वाव को दर्शाया गया है. लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि रानी की वाव एक ऐतिहासिक धरोहर है और इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में किया गया था.

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तो चलिए अब जानते हैं कि आख़िर 'रानी की वाव' वास्तव में क्या है और इससे जुड़ी कुछ बातें

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'रानी की वाव' के बारे में कुछ ही लोग जानते होंगे कि ये भारत की वास्तुशिल्प विरासत का एक नमूना है, जो गुजरात के पाटन जिले में सरस्वती नदी के तट पर स्थित है. इस ऐतिहासिक धरोहर को 2014 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थलों में शामिल किया था. यूनेस्को ने इस बावड़ी को भारत में स्थित सभी बावड़ियों की रानी के ख़िताब से नवाज़ा है. इसके अलावा इस जगह को 2016 में देश की सबसे साफ़-सुथरी विरासत होने का अवॉर्ड भी दिया गया था.

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- वास्तुकला की इस अद्भुत बावड़ी को सोलंकी साम्राज्य के समय बनाया गया था. ये बावड़ी सरस्वती नदी से जुड़ी हुई है. 10वीं सदी (सन 1063) में निर्मित ये बावड़ी सोलंकी वंश की भव्यता को दर्शाती है.

- रानी की वाव का निर्माण रानी उदयामति ने लोगों के विरुद्ध जाकर अपने पति की याद में करवाया था. क्योंकि गुजराती भाषा में 'बावड़ी' को 'बाव' कहते हैं इसलिए इसे 'रानी की बाव' कहा जाता है.

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- इस बावड़ी की लंबाई 64 मीटर, चौड़ाई 20 मीटर और गहराई 27 मीटर है. बावड़ी के नीचे एक छोटा द्वार है, जिसके अंदर 30 किलोमीटर लम्बी की एक सुरंग भी है, लेकिन फ़िलहाल इस सुरंग को मिट्टी और पत्‍थरों से ढंक दिया गया है.

क्या है इसका धार्मिक महत्व?

सनातन धर्म में प्यासे को पानी पिलाना और भूखे को खाना खिलाना ही सबसे पवित्र काम बताया जाता है. और यही कारण है कि सदियों से हमारे राजा-महाराजा जगह-जगह राहगीरों के लिए बावड़ियों का निर्माण कराते थे.

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बावड़ी में बनी बहुत सी कलाकृतियां और भगवान विष्णु की मूर्तियांस्थित हैं. इन मूर्तियों का निर्माण भगवान विष्णु के दशावतार के रूप में ही किया गया है. बाव की दीवारों पर भगवान राम, वामनावतार, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि अवतार और भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों के चित्र अंकित हैं.

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रानी की बाव की दीवारों पर बने धार्मिक चित्र और नक्काशीदार मूर्तियां इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय हमारे समाज में लोगों में धर्म और कला के प्रति बहुत अधिक समर्पण भाव था. यह बावड़ी वास्तु के लिहाज से भी बहुत विकसित मानी जाती है.

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वास्तुकला के हिसाब से इस बावड़ी की बनावट मारू-गुर्जरा आर्किटेक्चर स्टाइल में है. रानी की वाव के अंदर एक मंदिर और सीढ़ियों की सात कतारें भी हैं, जिसमें 1500 से भी ज़्यादा नक्काशीदार मूर्तियां उकेरी गई हैं.

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साल 2001 में इस बावड़ी से 11वीं और 12वीं शताब्दी में बनी दो मूर्तियां चोरी कर ली गईं थी. इनमें एक मूर्ति गणपति की और दूसरी ब्रह्मा-ब्रह्माणि की थी. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 2001 तक, यहां आने वाले पर्यटकों को सीढ़ी के अंत तक जाने की इज़ाज़त थी. लेकिन भुज भूकंप के बाद इसकी सुरक्षा को ध्याना में रखते हुए इसके कई हिस्सों को लोगों के लिए बंद कर दिया गया है.

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900 साल पुरानी इस बावड़ी की सुंदरता और भव्यता हर किसी का मन मोह लेती हैं, साथ ही अपने वैभवशाली इतिहास पर गर्व भी कराती है. अगर आप ऐतिहासिक और रहस्मयी स्थलों पर जाना पसंद करते हैं, तो 'रानी की वाव' आपको एक रोमांचकारी अनुभव दिला सकती है.