'मुंबई डब्बावाला' इस नाम सभी वाकिफ़ होंगे. वैसे तो इनको किसी परिचय की ज़रूरत नहीं है. पर फिर भी आपको बता दें कि मुंबई डब्बावाला ऐसे लोगोंॱ का एक समूह है जो मुंबई शहर में काम करने वाले सरकारी और ग़ैर-सरकारी कर्मचारियों को दोपहर का खाना उनके ऑफ़िस तक पहुंचाने का काम करता है. इन डिब्बावालों की सबसे बड़ी खासियत है कि ये हमेशा सही समय पर सही व्यक्ति तक सही डिब्बा ही पहुंचाते हैं. मगर सोचने वाली बात ये है कि कैसे ये लोग इस काम को मैनेज करते हैं कि कभी ग़लती से भी किसी को कोई ग़लत डिब्बा नहीं पहुंचाते हैं.

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ये बात है 1890 साल की, जब मुंबई के पुराने व्यापारिक जिले के एक पारसी बैंकर जिनका नाम फ़ोर्ट था, चाहते थे कि उनको घर का बना खाना ही ऑफ़िस में भी मिले, तब उन्होंने इसके लिए एक नौजवान लड़के को काम पर रख लिया, जो हर दोपहर को उनके घर से उनका टिफ़िन लेकर आता था. उस वक़्त शुरू हुई ये सर्विस पिछले कुछ सालों में एक संस्थान के रूप में स्थापित हो चुकी है. लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए इससे जुड़े लोगों को कई कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा है. मगर, आज ये मुंबई डब्बावाला दुनिया भर में फ़ेमस होने के साथ-साथ बड़े-बड़े मैनेंजमेंट इंस्टीट्यूट्स में स्टूडेंट्स के लिए केस स्टडी बन चुके हैं.

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हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुए एक आर्टिकल के अनुसार, इस सर्विस के शुरूआती दिनों के बारे में बात करते हुए मुंबई डब्बावाला एसोसिएशन के महासचिव, सुभाष तलेकर ने कहा, 'जब मुंबई वासियों के लिए ये सर्विस शुरू की गई थी ,तब इसमें एक ऐसी प्रभावी प्रणाली की कमी थी, जिससे ये तय हो सकता कि घर के खाने वाले खाने के डिब्बे ऑफिसेज़ में काम करने वाले व्यक्तियों की टेबल तक पहुंच चुके हैं.'

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उस वक़्त वो फ़ोर्ट बैंकर घर से टिफ़िन लाने के लिए बतौर मेहनताना उस लड़के को भले ही कुछ आने या पैसे ही देते होंगे, लेकिन आज के वक़्त में ये मुंबई डब्बावाला संस्थान 40-45 करोड़ रुपये की एक इंडस्ट्री बन चुकी है. एक आदमी से शुरू हुई इस इंडस्ट्री में आज की तारीख में 5000 लोग काम करते हैं, जो प्रतिदिन करीब-करीब 2,00,000 लंच बॉक्सेज़ को ऑफिसेज़ तक पहुंचाते हैं. एक लंच बॉक्स को ऑफ़िस तक पहुंचाने की फ़ीस 450 रुपये महीना है. डब्बावाला इस काम को पूरी कुशलता और दक्षता के साथ करते हैं. वहीं कभी-कभार 16 लाख डिलीवरी में बमुश्किल कोई ग़लती होती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनियाभर में इस काम में निपुणता का प्रतिशत 99.99 माना जाता है.

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मगर सोचने वाली बात है कि सालों पुरानी ये डिब्बा सर्विस आज भी कैसे अपने काम को दक्षता के साथ करती आ रही है. तो आइये जानते हैं इनके काम करने का तरीका क्या है.

- ये लोग लोगों का लंचबॉक्स उनके ऑफ़िस तक पहुंचाने के लिए हर रोज़ 60 से 70 किलोमीटर तक का सफ़र तय करते हैं. इसके लिए वो साईकिल या लोकल ट्रेन का इस्तेमाल करते हैं.

- ये घर से खाना लेकर ऑफ़िस तक पहुंचाने में 3 घंटे का समय लेते हैं.

- मुंबई डब्बावाला में काम करने वाले हर कर्मचारी को प्रतिमाह 9 से 10 हजार रुपये मिलते हैं.

- इसके अलावा कर्मचारियों को साल में एक महीने की पगार के बराबर बोनस भी दिया जाता है.

- अगर कोई भी कर्मचारी किसी भी नियम को तोड़ता है, तो उसको एक हज़ार रुपये का जुर्माना भरना पड़ता है.

मुंबई डब्बावाला अपने काम को बिना किसी ग़लती किये करने के लिए कुछ नियमों का पालन भी करते हैं:

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- इनका पहला और सबसे ज़रूरी नियम है कि काम के दौरान कोई भी नशा नहीं करेगा.

- कर्मचारियों को हमेशा सफ़ेद टोपी पहननी होती है.

- बिना बताये कोई कर्मचारी छुट्टी नहीं ले सकता है.

- इसके अलावा हर कर्मचारी को एक आईडी कार्ड दिया जाता है, जो उनको हमेशा अपने साथ रखना होता है.

- ये टिफ़िन पर ऐसी कोडिंग करते हैं कि जिसका टिफ़िन है, उनको ही पहुंचता है.

मुंबई डब्बावाला की सबसे सबसे बड़ी खासियत है समय की पाबंदी

मुंबई डब्बावाला कभी लेट नहीं होते. भले ट्रेन लेट हो या कोई और वजह पर डब्बावाला हमेशा समय पर आपका टिफ़िन पहुंचाता है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस काम से जुड़े लोग औसतन आठवीं पढ़े हुए हैं, किंतु टिफ़िन डिलीवरी में किसी तरह की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होती.

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सुभाष तलेकर का कहना है कि देश भर की हर बड़ी कंपनीज़ के कॉर्पोरेट ऑफिसेज़ मुंबई शहर में है, यहां हर तबके के लोग काम करते हैं, लेकिन हर कोई रोज़-रोज़ बाहर खाना खाने का खर्च नहीं उठा सकता और हानिकारक खाना नहीं खा सकता है. और वैसे भी घर का बना हुआ खाना अमूल्य होता है, इसलिए जो इस खाने को ऑफ़िस तक पहुंचाते हैं वो भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

एक डब्बावाला कर्मचारी ने बताया कि हमारे ग्राहक सुबह की पहली लोकल ट्रेन पकड़ते हैं, तो उनके लिए ये संभव नहीं है कि वो खाना बनने का इंतज़ार कर पाएं और घर से इतनी जल्दी खाना खाकर निकलना भी संभव नहीं होता. इसलिए हम उनका लंच घर से उठाते हैं और लंच टाइम तक उनके ऑफ़िस पहुंचाते हैं.

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125 साल पहले शुरू हुई ये सर्विस कथिततौर पर Six-Sigma एक्यूरेसी लेवल तक पहुंच चुकी है, यानी कि 16 लाख डिलीवरी में केवल एक ग़लती होती है. इनका सर्विस चार्ज ग्राहक की लोकेशन और दूरी के हिसाब से घटता और बढ़ता रहता है.

टिफ़िन डिलीवर करने वाले कर्मचारी मुंबई की लाइफ़लाइन कही जाने वाली सबअर्बन ट्रेन का भी इस्तेमाल करते हैं, ताकि टाइम से डिलीवरी हो सके. यहां की तीन रेलवे लाइन्स - वेस्टर्न, सेंट्रल और हारबर हैं, जिनसे 70 लोकल स्टेशंस जुड़ते हैं.

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इन कर्मचारियों में ज़्यादातर पुणे के आस-पास के गांवों से आते हैं, जो मराठा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और खुद को मराठा राजा शिवाजी के सैनिक मानते हैं. इन्होंने भीषण गर्मी हो या भारी बारिश हर मुश्किल से मुश्किल वक़्त में टाइम पर लंच बॉक्स पहुंचाकर खुद को और अपने संस्थान को गौरवान्वित किया है. उनका मानना है कि वो मावला के राजा शिवाजी के समर्थक हैं, उनके साथ क्या होगा? "

डब्बावाला के कर्मचारियों का विश्वास है कि हमारी परंपरा, जो अब अपनी तीसरी पीढ़ी में है, हमेशा ऐसे ही चलती रहेगी चाहे कितने ही फ़ूड डिलीवरी के नए रोजगार अवसर ही क्यों ना आते रहे. टिफ़िन सर्विस एक प्रतिष्ठित व्यवसाय है, क्योंकि यहां हम किसी के अंदर काम नहीं कर रहे हैं. ये हमारा अपना व्यवसाय है. यहां उन लोगों को काम मिलता है, जो कम पढ़े-लिखे हैं और समाज उनको किसी लायक नहीं यानि कि 'ज़ीरो' समझता है. यहां वो लोग हीरो बन जाते हैं, क्योंकि यहां वो इतना कमा लेते हैं, जितना एक ग्रेजुएट कमाता है महीने का. इस संस्थान के कर्मचारी अपनी जानकारी और प्रोफ़ेशन को छुपा कर नहीं रखते हैं, जो हमसे कुछ भी पूछना चाहता है हम उसको बताते और सिखाते हैं.

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इतने टाइम से चल रही डब्बावाला कम्पनी आज दुनिया भर में फ़ेमस हो चुकी है. हाल ही में एक ई-कॉमर्स कंपनी ने इनको अपने एक प्रोजेक्ट Last-mile Connectivity के लिए चुना. इसके अलावा डब्बावाला एसोसिएशन ने 60 मोटर बाइक्स भी रखी हुई हैं, उन लोगों के लिए जो एक्स्ट्रा इनकम करना चाहते हैं. वहीं अलग-अलग सेमिनार्स, वर्कशॉप आदि में भी इनके काम करने के तरीकों और मैनजमेंट के बारे में जानने के लिए इनको आमंत्रित किया जाता है.

इसके अलावा ये मुंबई डब्बावाला लोगों को लंचबॉक्स पहुंचाने के साथ-साथ समय-समय पर सोशल मेसेज भी देता है. जैसे कुलभूषण यादव मुद्दे पर इन 5000 कर्मचारियों ने लोगों तक उनकी जानकारी पहुंचाई. वहीं लोगों के घर में रोज़ बचे खाने को इकठ्ठा कर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का सराहनीय काम भी किया.

मुंबई डिब्बावालों को अगर रियल हीरो कहा जाए तो गलत नहीं होगा, इनके इस जज़्बे को सलाम!

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