पीरियड, महावारी, मासिक धर्म, मेंसेस, ये वो शब्द हैं, जो लोग अकसर फुसफुसा कर ही कहते हैं. वो क्या है न कि पीरियड के बारे में खुल के बात करने वाली औरतें अच्छी नहीं समझी जातीं. बचपन से लड़कियों को सिखा दिया जाता है कि इसके बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए. दुकानदार भी ऐसे काली थैली में पैड छुपा कर देते हैं, जैसे ड्रग्स हों. घर में जब लड़की महीने के उन दिनों में दर्द से तड़पती कोने में पड़ी होती है, तो भी भाई और घर के मर्दों से बस इतना ही कहा जाता है, 'उसकी तबियत ख़राब है'. क्या पीरियड होना शर्म की बात है? एक प्राकृतिक प्रक्रिया को लेकर ये शर्म क्यों है?

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क्या होती है समस्याएं?

बात करते हैं पीरियड में होने वाली शारीरिक समस्याओं के बारे में. मर्दों को आमतौर पर इसके बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं रहती, क्योंकि सेक्स की ही तरह, पीरियड के बारे में बात करना भी एक Taboo समझा जाता है. पीरियड में सभी औरतों को एक-सी परेशानी नहीं होती, कुछ औरतों को भारी रक्तस्त्राव होता है, तो कुछ को हल्का. हॉर्मोन्स का स्तर घटने-बढ़ने के कारण इन दिनों में औरतों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जैसे चिड़चिड़ापन, कंसंट्रेट न कर पाना, शरीर में दर्द, पेट में ऐंठन, सर दर्द, पेट में सूजन, कब्ज, नींद न आना, आदि. कुछ औरतों को इनमें से कुछ ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है और कुछ औरतों को पीरियड में लेबर पेन (प्रसव पीड़ा) जैसा दर्द होता है. कुदरत ने औरत को जीवन आगे बढ़ाने का जो वरदान दिया है, उसी का हिस्सा है ये प्राकृतिक प्रक्रिया. माना इस दर्द को कम करना किसी के बस में नहीं है, पर इस जननी के लिए समाज की इतनी ज़िम्मेदारी तो बनती है कि संवेदनशीलता से इस समस्या को समझे और उनके लिए एक छोटा सा कदम उठाए.

क्यों ज़रूरी है पीरियड लीव?

इन समस्याओं के कारण औरतों को इस समय में ऑफ़िस जाने में और काम करने में परेशानी होती है, कुछ औरतों को इतना अधिक दर्द होता है कि पेनकिलर्स लिए बिना काम कर पाना उनके लिए नामुमकिन सा हो जाता है. ऐसे में औरतों के पास कुछ ही विकल्प बचते हैं, या तो इन मुश्किल दिनों में कोई और बहाना बना कर छुट्टी लें या दावा खा कर जैसे-तैसे काम करने की कोशिश करती रहें. बहाना बना कर हर बार छुट्टी नहीं ली जा सकती, कई जगहों पर छुट्टी लेने से सैलरी भी काटी जाती है, इस वजह से भी कई औरतें छुट्टी नहीं ले पातीं. इन समस्याओं को देखते हुए कुछ कंपनियों ने औरतों को 'पीरियड लीव' देने का प्रावधान शुरू किया है, पर भारत में ज़्यादातर जगहों पर औरतों को ये सुविधा मुहैय्या नहीं है. पीरियड लीव यानि महीने में एक बार औरतों को दो दिन की छुट्टी दिए जाने का प्रावधान.

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चीन, जापान, ताइवान, इंडोनेशिया समेत कई देशों में ऐसा क़ानून है, जिसके तहत ये तय किया गया है कि कामकाजी महिलाओं को माहवारी के दौरान ज़रूरत पड़ने पर दफ़्तर से एक-दो दिन की छुट्टी मिल जाए. अब भारत में भी औरतों को पीरियड लीव देने की मांग छिड़ने लगी है.

ज़्यादा प्रोडक्टिव कर्मचारी के रूप में कर पाएंगी काम

पर आश्चर्य की बात ये है कि कई लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं. कुछ लोगों का मानना है कि माहवारी के दौरान छुट्टियां देने से कंपनी को व्यावसायिक नुक़सान होता है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि इतनी परेशानी सहते हुए एक कर्मचारी के लिए ठीक तरह से काम कर पाना वैसे भी मुमकिन नहीं रह जाता है. एक्सपर्ट्स का भी ये मानना है कि यदि औरतों को पीरियड लीव की सुविधा दी जाएगी, तो वो ऑफ़िस में बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगी. स्त्री रोग विशेषज्ञ Dr. Gedis Grudzinskas कहते हैं कि इससे औरतें ज़्यादा प्रोडक्टिव कर्मचारी के रूप में काम कर पाएंगी.

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अब समय आ गया है कि इस समस्या से जुड़ी चुप्पी को तोड़ा जाये. इससे जुड़ी शर्म के कारण कई औरतें अपने बॉस से भी अपनी तकलीफ़ नहीं बता पातीं और चुप-चाप दर्द झेलती रहती हैं. ये प्रक्रिया अन्य शारीरिक समस्याओं की तरह ही सामान्य है, जैसे सर्दी या बुखार. जब हम सर दर्द होने पर भी चार लोगों से कह देते हैं, तो इतना बड़ा दर्द चुप-चाप क्यों सहना?

इसका विरोध असंवेदनशीलता है

जान कर हैरानी होती है कि कुछ लोग इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि पीरियड लीव उन्हें भेद-भाव लगती है. उनका कहना है कि जब हर जगह औरतों के लिए बराबरी की बात हो रही है, तो यहां उन्हें ख़ास सुविधा क्यों दी जाये? वो इसका फायदा भी तो उठा सकती हैं?

ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि इस वक़्त जो दर्द औरत को सहना पड़ता है, उसके सामने ये कोई सुविधा नहीं है, बस ज़रा-सी राहत है.

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अगर पुरुषों के साथ ऐसी कोई समस्या रही होती, तो शायद ये सुविधा उन्हें बरसों पहले ही मुहैय्या हो गयी होती. 'औरत का गहना शर्म है', इस मानसिकता ने आज भी कई औरतों को अपने हक के लिए मांग करने से रोक रखा है.

कई औरतें भी ये मानती हैं कि पीरियड होने से कोई आपाहिज नहीं हो जाता, ये सुविधा औरतों को कमज़ोर बनाएगी. मैं फिर इस बात पर ज़ोर देना चाहूंगी कि हर औरत को इन दिनों में एक-सा दर्द नहीं होता है, पर कई औरतों को ऐसा दर्द होता है, जो बर्दाश्त करना मुश्किल होता है. प्रतिस्पर्द्धा के इस दौर में, जब तक वाकई परेशानी न हो, तब तक वैसे भी हर कोई अच्छा से अच्छा प्रदर्शन करना चाहता है. ये पूरी तरह उनका फैसला होना चाहिए कि वो छुट्टी लेना चाहती हैं, या नहीं. अगर आपको ज़रूरत महसूस नहीं होती, तो आप छुट्टी मत लीजिये. पर सिर्फ इसलिए कि आपको इस दौरान ज़्यादा परेशानी नहीं होती, आप सभी के लिए असंवेदनशील नहीं बन सकते. ये एक ऐसी समस्या है, जिससे दुनिया की आधी जनसंख्या जूझ रही है, इसे छोटा नहीं कहा जा सकता.

कई क्षेत्रों में बढ़ेगी महिलाओं की प्रतिभागिता

यूनिवर्सिटी कॉलेज, लन्दन के प्रोफ़ेसर John Guillebaud बताते हैं कि कई औरतों को पीरियड में हार्ट अटैक जैसा भयंकर दर्द होता है. ज़रा सोचिये ये कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसके बावजूद कुछ लोगों को पीरियड लीव भेद-भाव लगती है.

पीरियड लीव महिलाओं के लिए एक बेहद प्रगतिशील कदम है. पीरियड लीव के आभाव में, मुश्किल दिनों की समस्या के बारे में सोच कर कई औरतें पुलिस, फ़ौज जैसे पेशों में नहीं आना चाहतीं. यदि पीरियड लीव का प्रावधान हो जाये, तो इन क्षेत्रों में भी औरतों की प्रतिभागिता बढ़ेगी.

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पेनकिलर बैग में ले कर घूमने को मजबूर

शरीर से जब लगातार रक्त प्रवाहित हो रहा होता है और दर्द से ऐसा प्रतीत होता है कि गर्भाशय को कोई मरोड़ रहा है, तो कम से कम 2 पेनकिलर लिए बिना काम करना मुमकिन नहीं रह जाता. इस हिसाब से देखा जाये, तो सैंकड़ों औरतें जीवन में जाने कितनी पेनकिलर सिर्फ़ पीरियड लीव के आभाव के कारण खाने को मजबूर हैं. इनका शरीर पर कैसा असर होता होगा, ये बताने की ज़रूरत नहीं है. रिसर्चों में पाया गया है कि पेनकिलर ज़्यादा खाने से कैंसर की सम्भावना बढ़ जाती है. हम कितनी औरतों को इस छोटी-सी सुविधा न होने के कारण कैंसर के करीब धकेल रहे हैं. सेनेटरी पैड की ही तरह औरतें पेनकिलर भी बैगों में लेकर घूमने को मजबूर हैं.

करोड़ों औरतें पीरियड में ऑफ़िस में तड़पते हुए ये ही सपना देखती हैं कि काश इस समय वो रज़ाई में दुबक कर आराम कर पातीं. पेड पीरियड लीव इन करोड़ों औरतों के लिए राहत होगी. आप भी बताएं कि आप पीरियड लीव के सपोर्ट में हैं या नहीं?

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