इस तस्वीर को कैप्शन की ज़रूरत नहीं, करोड़ों शब्दों से ज़्यादा ताकतवर है ये एक अकेली तस्वीर.

बिना कुछ कहे, इस तस्वीर ने न जाने कितने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया. एक बच्चे की ये तस्वीर, संघर्ष, हिंसा, अविश्वास और डर के बादलों से घिरे कश्मीर की आवाज़ बन गयी है.

ये तस्वीर है कश्मीर के 9 साल के बुरहान फ़याज़ की. बुरहान अपने दोस्त को खो चुका है, वो दोनों साथ खेला करते थे. एक दिन उसका दोस्त आमिर नज़ीर और उसके साथ के कुछ लोग मिलिटेंट्स को सेना की गोलियों से बचाने के लिए सेना के काम को अवरुद्ध करने के लिए घटनास्थल पर गए. इस माहौल में सेना की तरफ़ से जो कार्यवाही हुई, उसमें आमिर की जान चली गयी. कौन सही था, कौन ग़लत, ये नही पता, लेकिन बुरहान से उसका दोस्त छिन गया.

ये तस्वीर आमिर की अंतिमयात्रा की है, उसके शव को देख कर बुरहान रो रहा है. उसे नहीं पता कि उसके दोस्त के जाने से बाक़ी लोगों को इतना मतलब क्यों है? क्यों वो सभी उसकी इस फ़ोटो को इतना ज़रूरी बता रहे हैं.

इस फ़ोटो को खींचने वाले हिंदुस्तान टाइम्स के फ़ोटोग्राफ़र वसीम अंद्राबी ने बताया कि वो इस सीन को रिपोर्टिंग के दौरान शूट कर रहे थे, तभी उन्होंने इस बच्चे का रोते हुए देखा. उसके चेहरे पर ज़ूम किया, तो उन्हें लगा कि थोड़ी देर में में वो ख़ुद भी रो देंगे.

इस तस्वीर ने कश्मीर समेत सोशल मीडिया में काफ़ी प्रतिक्रियाओं को हवा दी है.

ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट, ख़ुर्रम परवेज़ ने इस फ़ोटो को फैज़ अहमद फैज़ के एक शेर के साथ शेयर किया: 'खून के धब्बे धुलेंगे और कितनी बरसातों के बाद?'

इस तस्वीर ने लोगों को कुछ इस कदर हिला दिया है, जैसे Aylan Kurdi की फ़ोटो ने कर दिया था.

एक बार फिर वही सवाल सामने है. जंग की क़ुर्बानी मासूम क्यों दे रहे हैं? हम और कितने सालों तक सोचेंगे, और इस तरह कभी किसी फ़ौजी की, तो किसी कभी मासूम की जान लुटाते रहेंगे.

बुरहान का दोस्त चला गया, अब वो किस के साथ खेलेगा?