हिन्दी कविता मंच की शान अशोक चक्रधर ने अपनी चुटीली हास्य कविताओं से श्रोताओं के दिल में जो पहचान बनाई है, वो अमिट है. ऐसा नहीं है कि पद्मश्री अशोक चक्रधर ने सिर्फ़ हास्य कविताएं ही लिखी हैं, निबंध, नाटक, गीत आदी भी उनकी कलम से निकले हैं.

8 फ़रवरी, 1951 को उत्तर प्रदेश के खुर्जा में जन्म हुआ. पिता डॉ. राधेश्याम 'प्रगल्भ', जो ख़ुद भी एक कवि थे, उनकी देख-रेख में अशोक चक्रधर की साहित्य ट्रेनिंग बचपन में ही होने लगी थी. बचपन में वो मंचों पर कवियों के साथ बैठने लगे थे. उन्होंने अपनी पहली कविता 1962 में सोहन लाल द्विवेदी की अध्यक्षता में आयोजित कवि सम्मेलन में पढ़ी थी.

छात्र जीवन के बाद उन्होंने 1972 में दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य आरंभ कर दिया. उनकी पहली पुस्तक 'मुक्तिबोध की काव्य प्रक्रिया' 1975 में प्रकाशित हुई. उनकी किताब को युवा लेखक द्वारा लिखी गई वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक का पुरस्कार दिया गया.

उनका नाटक, 'बंदरिया चली ससुराल' का मंचन नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में हो चुका है. इसके निर्देशक श्री राकेश शर्मा थे.

अशोक चक्रधर के कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. 'बढ़े बच्चे', 'सो तो है', 'भोले भाले', 'तमाशा', 'चुटपुटकुले' आदी उनमें प्रसिद्ध हैं.

छोटे पर्दे के लिए भी अशोक चक्रधर ने ख़ूब काम किया है. कभी लेखक के रूप में, तो कभी अभिनता और संचालक के रूप में भी. दूरदर्शन पर दिखाई जाने वाली 'नई सुबह की ओर' को लोगों ने खूब सराहा था.

प्रोफे़सर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद अशोक च्रकधर हिन्दी भाषा के प्रसार के लिए काम कर रहे हैं. हिन्दी के विकास के लिए 'कंप्युटर के योगदान' विषय पर उन्होंने कई पावर पॉइंट प्रस्तुतियां दी हैं.

वरिष्ठ हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा अशोक चक्रधर के बारे में कहते हैं, 'अंग्रेज़ी में एक कहावत है 'जैक ऑफ़ ऑल, मास्टर ऑफ़ नन'. अशोक चक्रधर मंचीय काव्य-जगत में एकमात्र ऐसा नाम है, जिसने इस कहावत को झूठा साबित करके दिखाया है. वह 'जैक ऑफ़ ऑल' भी है तथा 'मास्टर ऑफ़ ऑल' भी है.

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