आज हम आपका ध्यान जिस ओर आकर्षित करना चाहते हैं, वो है अन्न की बर्बादी! जी हां, एक तरफ जहां देश में लोग भूख से मर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हर साल हमारे देश में 670 लाख टन खाद्य पदार्थ बर्बाद हो रहा है. एक सरकारी अध्ययन से ये बात सामने आई है कि ब्रिटेन में होने वाले कुल अनाज के उत्पादन के बराबर भारत में अनाज बर्बाद हो रहा है. यानी लगभग 92 हजार करोड़ रुपये का खाद्य पदार्थ हर साल बर्बाद हो जाता है. इतना ही नहीं, इन्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 23 करोड़ दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां खराब हो जाती हैं. वहीं विश्व खाद्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया भर में प्रतिदिन 20 हज़ार बच्चे भूखे रहने को विवश हैं, जबकि हकीकत में यह संख्या कहीं ज्यादा है. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) 2015 में भारत का स्थान 80वां (104 देशों में) है.

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क्या है इसका कारण?

इन आंकड़ों को जानने के बाद ज़ाहिर है कि हम देश की सरकार पर अपना गुस्सा दिखाते हैं, लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि व्यक्तिगत स्तर पर हम 'अन्न की बर्बादी' को किस प्रकार कम कर सकते हैं? अब आपको देते हैं, एक उदाहरण जो शायद हर किसी के घर में देखने को मिल जाएगा. जब कभी हम घर में किसी को खाने पर बुलाते हैं, तो हम उसके लिए तरह-तरह के व्यंजन बनाते हैं. लेकिन कई बार हमें इस बात का अंदाजा नहीं होता है कि कितने लोग आएंगे और कितने लोगों के लिए कितना खाना बनना है और इसकी वजह से बहुत सारा खाना बच जाता है, जिसे स्टोर करना मुश्किल हो जाता है और अंततः सारा खाना कूड़े में फेंक दिया जाता है.

भारत जो एक संस्कृति, सौहार्द्र से भरा हुआ देश है. यहां हर धर्म में खाने को बर्बाद करना एक तरह से पाप माना गया है. फिर भी यहां खाने की बर्बादी हो रही है. ऐसा लगता है कि जैसे अब लोगों की आदत बन गई है कि खाना बच गया तो कूड़े में फेंक दो. मध्यम वर्गीय लोग तो फिर भी बचे हुए खाने को किसी जानवर या गरीब को देने के बारे में सोच भी लेते हैं, लेकिन संपन्न वर्ग तो खाने को बर्बाद कर बाहर फेंकने में अपनी शान समझता है. क्या उनको ये नहीं दिखता कि देश में एक तबका या जनता भूख से बेहाल है. भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है और आये दिन यहां कोई न कोई उत्सव या त्योहार मनाया ही जाता है. जाहिर सी बात है कि इन अवसरों पर तरह-तरह का खाना बनता है और बर्बाद भी होता है.

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एक सर्वे के मुताबिक, अकेले बंगलुरु में एक साल में होने वाली शादियों में 943 टन पका हुआ खाना बर्बाद कर दिया जाता है. आपको बता दें कि इस खाने से लगभग 2.6 करोड़ लोगों को एक समय का खाना खिलाया जा सकता है. अब आप ही सोचिये कि ये तो सिर्फ़ एक शहर की बात है और हमारे देश में 29 राज्य और 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं. अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि हर साल होने वाली 'अन्न की बर्बादी' का आंकड़ा क्या होगा. सिर्फ़ उत्सवों और त्योहारों के समय ही नहीं रोजमर्रा के दिनों में भी अन्न की बर्बादी कुछ कम नहीं है. जैसे ऑफिस की कैंटीन, स्कूल के लंच बॉक्स, हर घर के किचन में बचने वाला खाना, इसका तो कोई हिसाब ही नहीं है.

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भारत जैसे देश में, जहां लाखों लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं, वहीं हम अगर इस तरह खाने को बर्बाद कर रहे हैं, तो क्या हम एक सजग और ज़िम्मेदार नागरिक हैं? क्या हमें इस बारे में नहीं सोचना चाहिए कि हमारे ही देश में लाखों लोगों को दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिलती है? हमें गहराई से इस बारे में सोचना होगा कि हम अपने स्तर पर खाने की बर्बादी को कैसे रोक सकते हैं?

अगर हर घर में लोग खाने की बर्बादी को रोकने के लिए उपयुक्त कदम उठाएंगे, तो काफी हद तक इस समस्या से निजात मिल सकती है. इसके लिए हमें ज्यादा कुछ नहीं करना है, बस अपनी रोजमर्रा की आदतों में थोड़ा बदलाव लाना है. जैसे:

- जब आप किसी पार्टी या समारोह में जाते हैं, तो सिर्फ उतना ही खाना अपनी प्लेट में डालें, जितना आप खा सकें.

- ऑफिस की कैंटीन या रेस्टोरेंट में उतना ही खाना आर्डर करें, जितना आप खा सकें. कई बार दिखावे के चक्कर में हम ज्यादा खाना मंगाते हैं और बाद में छोड़ देते हैं, जो कूड़े में जाता है.

- बच्चों के लंच बॉक्स में भी उतना ही खाना दें, जितना वो खा सकें और अपने बच्चे को भी खाने की बर्बादी के बारे में जागरूक करें.

- उतना ही खाना पकाएं, जितनी ज़रूरत हो. अगर खाना बच जाता है, तो उसे फेंकने के बजाय अच्छे से फ्रिज में स्टोर करके अगले दिन इस्तेमाल कर लें.

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देश की सरकार तो अपने स्तर पर इस पार काम कर ही रही है, उसको करने देते हैं, लेकिन तब तक कम से कम हम तो खुद और दूसरों को इस बारे में सजग करने के प्रयास कर ही सकते हैं. लोगों को इस बारे में जागरूक करने का काम भी कर सकते हैं. तो चलिए आज हम सब ये प्रण लेते हैं कि हम अन्न और जल की बर्बादी नहीं करेंगे. आप भी इस बारे में अपनी राय हमको कमेंट करके बता सकते हैं.

इस आर्टिकल में दिए गए आंकड़े जनसत्ता में छपी रिपोर्ट के अनुसार है.