अगर इंसान के अन्दर कुछ कर दिखाने का बुलंद हौसला है और अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए वो जी-जान लगा देता है तो ऐसी कोई ताकत नहीं है जो उसका रास्ता रोक पाए और इस बात को चरितार्थ कर दिखाया है 62 वर्षीय एक राजरानी कुशवाहा ने.

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर के ईश्वरीगंज गांव में रहने वाली राजरानी कुशवाहा ने 'स्वच्छ भारत अभियान' को सफ़ल बनाने के उद्देश्य से 2000 की आबादी वाले अपने गांव को खुले में शौच से मुक्त करा दिया है. राजरानी एक साधारण सी महिला हैं और वो ठेठ बोली में लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक कर रही हैं.

आपको बता दें कि राजरानी खेती-बाड़ी करके अपना जीवन यापन करती हैं. लेकिन उनके इरादे बुलंद हैं. तभी तो केवल तीन महीनों के अन्दर ही उन्होंने अपने गांव को खुले में शौच से मुक्त करा डाला.

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गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान के बारे में जानने के बाद उसका उन पर बहुत ही ज़्यादा असर हुआ. वो बताती हैं कि पहले मैं भी खुले में शौच के लिए जाने को मजबूर थी. हालांकि, मुझे इसमें शर्म भी आती थी. घर की बहू-बेटी भी बहार ही जाती थीं, जिस कारण गन्दगी होती थी और बच्चे बीमार हो जाते थे.'

इसके साथ ही वो बताती हैं कि वो इन सब परिस्थितियों से छुटकारा पाना चाहती थीं और जैसे ही उन्हें पीएम मोदी के इस अभियान के बारे में पता चला तो उन्होंने इस मौके का फायदा उठाने के बारे में सोचा. साथ ही वो कहती हैं कि ये सबसे पहले उन्होंने खुद को बदला और अपने घर में एक शौचालय बनवाया. उसके बाद उन्होंने गांव वालों को घर में शौचालय बनवाने के फायदे और खुले में शौच करने के नुकसानों के बारे में बताना शुरू किया. धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी और उनकी मेहनत और लगन का ही नतीजा है कि आज गांव के हर घर में शौचालय बन गए हैं.

इस मुहिम में राजरानी ने अपने पैसे भी किये खर्च

आपको बता दें कि राजरानी के परिवार में पति, चार बेटे, चार बहू और तीन प्रपौत्र हैं. वो बताती हैं कि कुछ महीने पहले तक उनका पूरा परिवार खुले में शौच जाता था. अच्छा तो नहीं लगता था, लेकिन मजबूरी थी. फिर पीएम के स्वक्षता अभियान की चर्चा होने लगी और उनका यह अभियान की जानकारी गांव तक पहुंची. उसके बाद ही राजरानी ग्राम प्रधान के पास पहुंची और उनसे शौचालय बनवाने के लिए मिलने वाली मदद की बारे में पूछा. उसके बाद ही राजरानी को शौचालय बनवाने के लिए 12,000 रुपये की सहायता मिली.उसके बाद उन्होंने अपनी जेब से 20 हजार रुपये और लगाकर घर में शौचालय बनवाया.

राजरानी की इस मुहिम की डगर आसान नहीं थी. इस काम में उनको कई मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा. उनके इस अभियान में इंटरमीडिएट की छात्रा दुर्गेश, पायल, कांति सहित गांव कि कई महिलाओं ने बढ़-चढ़कर उनका साथ दिया. ये सभी महिलायें राजरानी के साथ मिलकर सुबह होते ही टॉर्च और डंडे लेकर निकल जाती थीं. और जो भी उनको खुले शौच जाता दिखता था उसको इसके दुष्परिणामों के बारे में बताती थीं. इतना ही नहीं घर-घर जाकर महिलाओं को घर में शौचालय बनवाने और खुले में शौच जाने के नुक्सान के बारे में बताती थीं. गांव के कुछ लोगों ने इनका विरोध भी किया, लेकिन राजरानी नहीं रुकीं. कुछ टाइम बाद विरोध करने वाले भी इनकी इस मुहिम में शामिल हो गए.

राजरानी के अभियान के बाद बदल गई गांव की तस्वीर

गांव के सभी घरों कि महिलाओं ने बढ़ाया कदम और ग्राम प्रधान से मांगी मदद. राजरानी की इस मुहिम की वजह से 3 महीनों में ही गांव के 357 घरों में शौचालय बन गए. इतना ही नहीं 59 लोगों ने बिना किसी सरकारी मदद के अपने-अपने घरों में शौचालय बनवाए. इसके साथ ही एक सराहनीय काम ये हुआ कि ग्राम प्रधान ने कई महिलाओं का बैंक खाता भी खुलवाया और उनके खातों में ही सरकारी मदद से मिलने वाली धनराशि को जमा करवाया.

राजरानी बताती हैं कि गांव को स्वच्छ बनाने में सबसे ज्यादा घर की महिलाओं का हाथ और कोशिश है. राजरानी और गांव की दूसरी महिलाओं के इस काम की जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने भी सराहना की और उन्हें मेडल देकर सम्मानित भी किया. राजरानी बताती हैं कि हमारे गांव को स्वच्छ बनाने में सबसे ज्यादा घर की महिलाओं की कोशिश थी.

आपाको बता दें कि इस गांव के लोग अपने आस-पास की सफ़ाई की जिम्मेदारी खुद उठाते हैं. यहां की चमचमाती सड़कें, साफ-सुथरी गलियां और लहलहाती फसलें गांव की खुशहाली का प्रतीक बन चुकी हैं.

Source: amarujala